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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 378 of 404

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Page 378

( ३६० ) माधवनिदान ।

पीली सूजनयुक्त और नरम और पित्तके विकार करें और राजिलका दंश चिकना
पीले रंगका वा गाढा तथा उसकी सूजन कठोर होय, उसमें गाढा रुधिर निकले
तथा सब प्रकारके कफविकार हों ये लक्षण राजिलसर्पके काटनेके हैं ॥
विशिष्टदेशमें तथा विशिष्टनक्षत्रमें काटनेके असाध्य लक्षण ।
अश्वत्थदेवतायतनश्मशानवल्मीकसंध्यासु चतुष्पथेषु ।
याम्ये च दष्टाः परिवर्जनीया ऋक्षे शिरामर्मसु ये च दष्टाः ॥१९॥
पीपलके वृक्षके नीचे, देवताओंके मन्दिरमें, मसानमें, बँबईमें सन्ध्याकाल ( प्रातः
और सायंकालकी सन्धि ), चौराहेमें, भरणी नक्षत्रमें, चकारसे आर्द्रा, आश्लेषा, मूल,
मघा, कृत्तिका ये नक्षत्रोंमें शिरानाडीके मर्ममें सर्पके काटनेसे मनुष्य बचे नहीं ॥
गर्मी होनेसे विषका जोर होता है उसके लक्षण ।
दर्वीकराणां विषमाशु हंति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति ।
दर्वीकर ( नाग ) का विष तत्काल प्राणनाश करे और विष गर्मीके योगसे
दुगुना जोर करते हैं ॥
अजीर्णपित्तातपपीडितेषु बालेषु वृद्धेषु बुभुक्षितेषु ।
क्षीणक्षते मेहिनि कुष्ठदुष्टे रूक्षेऽबले गर्भवतोषु चापि ॥ २० ॥
अजीर्ण पित्त और सूर्यकी घाम इनसे पीडित, बालक, वृद्ध, भूखा, क्षीण होगया
हो, उरःक्षती, प्रमेहवाला, कोढी, रूखा, निर्बल और गर्भिणी इनको सर्पके काटनेसे
तत्काल मृत्यु हो ॥
सर्पके काटनेसे असाध्य लक्षण ।
शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमस्ति राज्यो लताभिश्च न सम्भवंति ।
शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ॥ २१ ॥
जिसको विषका अमल चढ गया हो उसके शस्त्रके घाव करनेसे रुधिर निकले
नहीं अथवा चाबुक मारनेसे अंगमें उपडे नहीं अथवा शीतल पानी अंगपर डालनेसे
रोमांच न हों उस मनुष्यका जहर उतारनेका उद्योग न करें ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
जिह्मं मुखं यस्य च केशशातो नासावसादश्च सकंठभंगः ।
रक्तः सकृष्णः श्वयथुश्च दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च विवर्जनीयः ॥२२॥
जिसका मुख टेढा और स्तब्ध हो जाय, केश ( बाल ) स्पर्श करनेसे टूट २ कर
गिर पडें, नाककी हड्डी टेढी हो जाय, नाड नीचेको झुक पडे, ऊंची न होय और