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कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी

DevanagariSanskritpublished268 pages

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( २४८ )
(b) जब ब्रह्मचारी शङ्कर जी की निन्दा करने लगा तो उस
समय पार्वती ने कहा कि तुम शङ्कर जी को ठीक से
नहीं समझते हो जो ऐसा कहते हो। क्योकि मन्द
पुरुष महात्माओं के चरित्र की निंदा करते ही हैं।
(c) पार्वती से तप करने का कारण पूछते हुए ब्रह्मचारी
शङ्कर जी ने कहा हे पार्वती यह तो हो नहीं सकता
कि किसी अपमान के कारण से तुम तपस्या कर रही
हो कारण कि पिता के घर में अपमान कैसे हो सकता
है। इसी बात को पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि
सर्प की मणि को कोन छू सकता है। भाव यह कि
तुम्हारा अपमान करना सर्प की मणि को छूने के
समान है।
IV. चन्द्रमौलौ—में ‘ यस्यच भावेनभावलक्षणं से सप्तमी
हुई है।
QUESTIONS 1941.
I Explain the following in tika form
(a) विपत्प्रतीकारपरेण मङ्गलं
निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा
जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः
किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः
(b) अवस्तुनिर्बन्धपरे कथं नु ते
करोऽयमामुक्तविवाहकौतुकः