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कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी

DevanagariSanskritpublished268 pages

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( २४७ )
(b) ब्रह्मचारिमुखात् शिवस्यनिन्दां श्रुत्वा पार्वती कथयति
हे वटु—सः हरः अकिञ्चन सन् निर्धनोऽपिसन्
सम्पदां ऐश्वर्यस्य प्रभव कारणं पितृसद्मगोचरःसन्
श्मशानाश्रयः सन् त्रिलोकनाथः त्रयाणाम् लोकानां
नाथः स भीमरुपः भयङ्करकारः सन् शिवः सौम्यरुप
इति उदीर्यते कथ्यने अतः पिनाकिनः हरस्य याथार्थ्य
विदः यथाभूतोऽर्थो यथार्थस्तस्य भावो याथार्थ्यम्
तत्वतस्य विदः न सन्ति। लोकोत्तरमहिम्ना निर्लेपस्य
यथाकथंचिदवस्थानं न दोषाये तिभावः।
II. " O thou of stooping limbs, hence forth I am
thy Slave, bought by thy austerities "—as
the Moon crested God said these words, she
immediately forgot ( all ) her exhaustion
caused by the austerities , for, fatigue gives
fresh vigour again by the fruition ( i e. the
achievement of the desired object ).
III. (a) जब ब्रह्मचारी का रूप धारण कर शंकरजी पार्वती से
उनकी तपस्या का कारण पूछने लगे तो पार्वती ने
उनको उत्तर दिया कि हे ब्रह्मचारी मैं बड़े भारी पद
को पाने की (अर्थात् शङ्कर को पाने की) इच्छा से
यह तप कर रही हूँ। क्योंकि मनुष्य की इच्छायें कहाँ
नहीं जा सकतीं अर्थात् मनुष्य हर एक वस्तु की इच्छा
कर सकता है। पार्वती के कहने का भाव यही है कि
चूंकि मनुष्य के इच्छाओं का अन्त नहीं है अतएव मैं
भी शंकर जी को पति पाने की इच्छा से तपस्या कर
रही हूँ।