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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

१३ बालकाण्ड
महाराज जनकका, सीताका, हमारा, तेरा और तुलसीका सभीका
मनमाना होगा । अरी आली ! अब सन्तुष्ट होकर रानी कौसल्याकी
कोखपर अपना शरीर न्यौछावर कर दो और महाराज दशरथकी
भी बलैयाँ लो ।
दूब दधि रोचनु कनक थार भरि भरि
आरति सँवारि बर नारि चलीं गावतीं ।
लीन्हें जयमाल करकंज सोहैं जानकीके
पहिरावो राघोजूको सखियाँ सिखावतीं ॥
तुलसी मुदित मन जनकनगर-जन
झाँकतीं झरोखें लागीं सोभा रानीं पावतीं ।
मनहुँ चकोरीं चारु बैठीं निज निज नीड
चंदकी किरिन पीवैं पलकौ न लावतीं ॥१३॥
सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुवर्णके थालोंमें दूब, दही और रोली भर-
भरकर आरती सजा गाती हुई चलीं । श्रीजानकीजीके करकमल
जयमाला लिये सुशोभित हो रहे हैं । उन्हें सखियाँ सिखाती हैं कि
श्रीरामचन्द्रजीको जयमाला पहना दो । तुलसीदासजी कहते हैं-
जनकपुरके सभी लोग मनमें प्रसन्न हैं । झरोखोंमें आकर झाँकती
हुईं रानियाँ भी बड़ी ही शोभा पा रही हैं, मानो अपने-अपने
घोंसलोंमें बैठी हुई मनोहर चकोरियाँ चन्द्रमाकी किरणोंका अनिमेष
नेत्रोंसे पान कर रही हैं ।
नगर निसान बर बाजैं ब्योम दुंदुभीं
बिमान चढ़ि गान कैके सुरनारि नाचहीं ।
जयति जय तिहुँ पुर जयमाल रामउर
बरषै सुमन सुर रूरे - रूप राचहीं ॥