कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context७२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
(१) स्कन्धावारमुत्सृज्य वा वनगूढः शत्रुः सत्रान्निष्क्रान्तं घातयेत् ।
(२) मित्रासारमुख्यव्यञ्जनो वा संरुद्धेन मैत्रीं कृत्वा दूतमभित्यक्तं प्रेषयेत्—'इदं ते छिद्रम्, इमे दूष्याः, संरोद्धुर्वा छिद्रमयं ते कृत्यपक्षः' इति। तं प्रतिदूतमादाय निर्गच्छन्तं विजिगीषुर्गुहीत्वा दोषमभिख्याप्य प्रवास्यापगच्छेत् ततः। मित्रासारव्यञ्जनो वा संरुद्धं ब्रूयात्—'मां त्रातुमुपनिर्गच्छ, मया वा सह संरोद्धारं जहि' इति। प्रतिपन्नमुभयतः संपीडनेन घातयेत्, जीवग्राहेण वा राज्यविनिमयं कारयेत्, नगरं वास्य प्रमृद्नीयात्, सारबलं वास्य वमयित्वाऽभिहन्यात् ।
सेना थक गई है, या लंबे युद्ध के कारण शत्रु के बहुत से आदमी जख्मी हो गये हैं या मर गये हैं, या रातभर जागने तथा थक जाने के कारण लोग सोये हैं, या आकाश में दुर्दिन छाया है, या नदी में बाढ़ आ गई है, या भीषण तुषारापात हुआ है'—ऐसी अवस्था में शत्रु पर एकदम धावा बोल देना चाहिए ।
( १ ) अथवा छावनी या पड़ाव न डाल कर जंगल में जाकर छिपा जाय और जैसे ही शत्रुदल जंगल से निकलने लगे कि उसके ऊपर विजिगीषु की सेना एकदम बरस पड़े ।
( २ ) मित्र के वेष में रहने वाला या मित्र की सेना में मुखिया के वेष में रहने वाले विजिगीषु के गुप्तचर को चाहिए कि वह घिरे हुए शत्रु-राजा के साथ मित्रता करके अपने किसी वध्य पुरुष के द्वारा उसके लिए इस आशय का एक संदेश भेजे कि 'तुम्हारे अंदर अमुक-अमुक दोष हैं, अमुक-अमुक व्यक्ति तुम्हारे द्रोही हैं, घेरा डालने वाले विजिगीषु की अमुक-अमुक कमजोरियाँ हैं, और विजिगीषु के लुब्ध, क्रुद्ध, भीत आदि अमुक-अमुक लोग तुम्हारे मित्र हैं।' जब वह दूत शत्रु-राजा का उत्तर लेकर लौट रहा हो तो विजिगीषु उसको रास्ते में ही पकड़ कर उस पर अपकारी होने का दोष लगावे और इसी अपराध में उसको मार कर वहाँ से ( उस उत्तर लेखपत्र को साथ लेकर ) चला जाय । अथवा मित्र के वेष में या मित्र सेना के प्रमुख के वेष में रहने वाला वह गुप्तचर उस घिरे हुए राजा से कहे कि 'मेरी रक्षा के लिए तुम्हें तैयार हो जाना चाहिए, अथवा हम दोनों मिल कर तुमको रोकने वाले विजिगीषु को मार डालें।' जब वह इस प्रस्ताव को स्वीकार कर ले तो दोनों ओर से घेर कर उसको मार दिया जाय अथवा उसको गिरफ्तार कर उसकी जगह उसके किसी पुत्र बांधव को अभिषिक्त किया जाय या उसकी राजधानी को बरबाद कर दिया जाय । अथवा उसके सारबल को दुर्ग से बाहर निकाल कर उसको मार दिया जाय ।