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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 809 of 918

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Page 809

प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्गं को अधिकार में करना ७२५

पलाशपुष्पकेशमषितैलमधूच्छिष्टकश्रीवेष्टकयुक्तोऽग्नियोगो विश्वासघाती वा । तेनावलिप्तः शणत्रपुसवल्कवेष्टितो बाण इत्यग्नियोगः ।
(१) नत्वेव विद्यमाने पराक्रमेऽग्निमवसृजेत् । अविश्वास्यो ह्यग्निः दैवपीडनं च, अप्रतिसंख्यातप्राणिधान्यपशुहिरण्यकुप्यद्रव्यक्षयकरः । क्षीणनिचयं चावाप्तमपि राज्यं क्षयायैव भवति ।
(२) इति पर्युपासनकर्म ।
(३) ‘सर्वारम्भोपकरणविष्टिसम्पन्नोऽस्मि, व्याधितः पर उपधाविरुद्धप्रकृतिरकृतदुर्गकर्मनिचयो वा निरासारः सासारो वा पुरा मित्रैः सन्धत्ते’ इत्यवमर्दकालः ।
(४) स्वयमग्नौ जाते समुत्थापिते वा प्रहवणे प्रेक्षानीकदर्शनसङ्ग-सौरिककलहेषु नित्ययुद्धश्रान्तबले बहुलयुद्धप्रतिविद्धप्रेतपुरुषे जागरण-क्लान्तसुप्तजने दुर्दिने नदीवेगे वा नीहारसम्प्लवे वानमृद्नीयात् ।


मिलाकर बनाया गया अग्नियोग निश्चय ही विश्वासघाती होता है । (अर्थात् जहाँ आग लगने की कतई भी संभावना न हो, वहाँ भी इसका प्रयोग करने पर आग लग जाती है । अचूक अग्नियोग होने के कारण ही इसको विश्वासघात कहा गया है ।) उक्त सभी वस्तुओं के योग से सना हुआ और सन तथा ककड़ी की बेल की छाल से लपेटा हुआ बाण भी अग्नियोग होता है, अर्थात् जहाँ मारा जाता है वहीं आग लगा देता है ।

( १ ) युद्ध के प्रारम्भ में इन अग्नियों को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि अग्नि का कोई विश्वास नहीं है और फिर उसे दैवपीड़न कहा गया है । अग्निदाह से असंख्य प्राणियों, धन, धान्य, पशु एवं अनेक प्रकार के द्रव्यों का नाश हो जाता है । ऐसा नष्ट-भ्रष्ट राज्य अपने हाथ में आ जाने पर भी क्षय का ही कारण होता है ।

( २ ) यहाँ तक शत्रु-दुर्ग को घेरने के संबंध में निरूपण किया गया ।

( ३ ) जब विजिगीषु वह समझ ले कि ‘वह सब प्रकार की युद्धोपयोगी सामग्री से संपन्न है, सभी तरह के कार्य करने वाले आदमी उसके पास मौजूद हैं; उधर शत्रु व्याधिग्रस्त है, उसकी प्रकृतियाँ धोखा देने वाली हैं, दुर्ग आदि की मरम्मत तथा धान्य आदि का संग्रह भी उसने नहीं किया है, मित्र की सहायता की भी संभावना नहीं है, अथवा सहायता सम्भव होने पर भी अभी तक वह संधि करने में ही फंसा हुआ है’—ऐसे शत्रु पर फौरन चढ़ाई कर देनी चाहिए ।

( ४ ) अथवा विजिगीषु जब देखे कि ‘शत्रु के दुर्ग में अपने-आप आग लग गई है, या सब लोग पार्टियों तथा उत्सवों में व्यस्त हैं या खेल-तमाशों तथा चाँदमारी में आसक्त हैं या शराबियों ने कोई उपद्रव खड़ा कर दिया है या लगातार के युद्ध में शत्रु