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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्रकरण १२४-१२६मध्यमचरितोदासीनचरित-मण्डलचरितानि
अध्याय १८

(१) मध्यमस्यात्मा तृतीया पञ्चमी च प्रकृती प्रकृतयः । द्वितीया च चतुर्थी षष्ठी च विकतयः । तच्चेदुभयं मध्यमोऽनुगृह्णीयात्, विजिगीषुर्मध्यमानुलोमः स्यात् । न चेदनुगृह्णीयात्प्रकृत्यनुलोमः स्यात् ।

(२) मध्यमश्चेद्विजिगीषोर्मित्रं मित्रभावि लिप्सेत, मित्रस्यात्मनश्च मित्राण्युत्थाप्य मध्यमाच्च मित्राणि भेदयित्वा मित्रं त्रायेत । मण्डलं वा प्रोत्साहयेत्—‘अतिप्रवृद्धोऽयं मध्यमः सर्वेषां नो विनाशाय अभ्युत्थितः सम्भूयास्य यात्रां विहनाम’ इति । तच्चेन्मण्डलमनुगृह्णीयात् मध्यमावग्रहेणात्मानमुपबृंहयेत् । न चेदनुगृह्णीयात्, कोशदण्डाभ्यां मित्रमनुगृह्य ये मध्यमद्वेषिणो राजानः परस्परानुगृहीता वा बहवस्तिष्ठेयुरेकसिद्धा वा

मध्यम चरित, उदासीन चरित और मण्डल चरित

( १ ) मध्यम, स्वयं और तीसरी तथा पाँचवीं प्रकृति ( अर्थात् स्वयं, मित्र और मित्र-मित्र ) ये तीनों मध्यम की प्रकृति कहलाती हैं। इसी प्रकार शत्रु, शत्रु का मित्र और शत्रु के मित्र का मित्र, ये तीनों मध्यम की विकृति कही जाती हैं। मध्यम को चाहिए कि वह इन दोनों प्रकार के राजाओं पर समान अनुग्रह बनाये रखे; और विजिगीषु को चाहिए कि वह सदा मध्यम राजा के अनुकूल बना रहे। यदि मध्यम राजा दोनों प्रकार की प्रकृतियों पर अनुग्रह न कर सके तो आत्मप्रकृति को वह अवश्य ही अपने अनुकूल बनाये रखे।

( २ ) यदि मध्यम राजा विजिगीषु राजा के मित्रभावी-मित्र को अपने अधीन करना चाहे तो उस समय विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने मित्र-राजाओं के मित्रों और अपने मित्र-राजाओं की सहायता करके तथा मध्यम के मित्रों को उनसे फोड़कर अपने मित्र की रक्षा करे। अथवा राजमण्डल को वह मध्यम के विरुद्ध यह कहकर उत्तेजित करे; ‘देखो, अति उन्नत हुआ यह मध्यम राजा हम सब को नष्ट करने पर तुला है। हमको चाहिए कि एक होकर हम इसके आक्रमण को रोकें!’ इस प्रकार उकसाया हुआ राजमण्डल यदि विजिगीषु की सहायता करने के लिए तैयार हो जाय तो उसके सहयोग से मध्यम का निग्रह करके स्वयं को उन्नत बनाये। यदि राजमण्डल विजिगीषु को सहायता देना स्वीकार न करे तो वह धन