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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 629 of 918

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Page 629

प्र० १२४-१२६ : अ० १८ ] मध्यमौदासीनमण्डल-चरित ५४५

बहवः सिद्धयेयुः परस्पराद्वा शङ्किता नोत्तिष्ठेरन्, तेषां प्रधानमेकमासन्नं वा सामदानाभ्यां लभेत । द्विगुणो द्वितीयं त्रिगुणस्तृतीयम् । एवमभ्युच्चितो मध्यममवगृह्णीयात् । देशकालातिपत्तौ वा सन्धाय मध्यमेन मित्रस्य साचिव्यं कुर्यात् । दूष्येषु वा कर्मसन्धिम् ।
(१) कर्शनीयं वाऽस्य मित्रं मध्यमो लिप्सत, प्रतिस्तम्भयेदेनम्—'अहं त्वा त्रायेय' इत्याकर्षणात् । कर्शितमेनं त्रायेत ।
(२) उच्छेदनीयं वाऽस्य मित्रं मध्यमो लिप्सते, कर्शितमेतं त्रायेत मध्यमवृद्धिभयात् ।
(३) उच्छिन्नं वा भूम्यनुग्रहेण हस्ते कुर्यादन्यत्रापसारभयात् ।


तथा सेना के द्वारा अपने मित्र की सहायता करे। जो बहुत से राजा मध्यम के साथ द्वेष रखते हों; अथवा जो आपस में एक-दूसरे की सहायता करके मध्यम का अनिष्ट करना चाहते हों; या मध्यम के शत्रु विजिगीषु के अनुकूल हो जाने पर सब अनुकूल हो जाँय; अथवा जो परस्पर सम्मिलित विजय-लाभ की इच्छा रखते हुए भी एक-दूसरे के भय से आक्रमण करने के लिए तैयार न हों; या मध्यम के शत्रु-राजाओं में से प्रमुख राजा, या अपने देश के सभी राजाओं को साम, दाम आदि के द्वारा अपने अनुकूल बनाये—इस प्रकार दूसरे राजा की सहायता मिलने से विजिगीषु का बल दुगुना, तीसरे राजा की सहायता मिलने पर तिगुना हो जाता है। इन तरीकों से अपनी शक्ति को बढ़ाकर विजिगीषु, मध्यम को वश में करे। अथवा देश तथा काल के अनुसार विजिगीषु सीधे मध्यम के साथ ही सन्धि कर ले और फिर अपने मित्र-भावी मित्र के साथ उसकी सन्धि करा दे। यदि ऐसा सम्भव न हो तो मध्यम के दूष्य पुरुषों के साथ मिलकर आग लगवा कर या कोई उपद्रव कराके कर्मसंधि करे।

(१) विजिगीषु को दुर्बल बनाने वाले (कर्शनीय) मित्र को यदि मध्यम अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने उस मित्र को सुरक्षा का आश्वासन देकर मध्यम से अभय कर दे। परन्तु यह अभय वचन उसी समय तक रहे जब तक कि मध्यम के द्वारा उसे दुर्बल न बना दे। दुर्बल हो जाने पर विजिगीषु उसकी रक्षा करे।

(२) यदि विजिगीषु को नष्ट करने योग्य मित्र को मध्यम अपने अधीन करना चाहे, तो विजिगीषु अपने उस मित्र की तब रक्षा करे जब वह मध्यम द्वारा अच्छी तरह सता दिया गया हो। उसकी रक्षा इसलिए आवश्यक है कि मध्यम राजा शक्ति प्राप्त कर विजिगीषु को ही न सताने लगे।

(३) अथवा विनष्ट हुए अपने उस मित्र को भूमि देकर वह अपने वश में कर ले, अन्यथा यह सम्भव हो सकता है कि वह शत्रुपक्ष में जाकर मिल जाय।

३५ कौ०