कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १२२-१२३ : अ० १७ ] सन्धिकर्म और सन्धिमोक्ष ५४३
(१) आसन्ने चानुपाते सत्रं वा गृह्णीयात् । सत्राभावे हिरण्यं रसविद्धं वा भक्ष्यजातमुभयतः पन्थानमुत्सृजेत् । ततोऽन्यतोऽगच्छेत् ।
(२) गृहीतो वा सामादिभिरनुपातमतिसन्दध्यात् । रसविद्धेन वा पथ्यदानेन ।
(३) वारुणयोगाग्निदाहेषु वा शरीरमन्यदाधाय शत्रुमभियुञ्जीत—पुत्रो मे त्वया हत इति ।
(४) उपात्तच्छन्नशस्त्रो वा रात्रौ विक्रम्य रक्षिषु ।
शीघ्रपातैरपसरेद् गूढप्रणिहितैः सह ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे सन्धिकर्म-सन्धिमोक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः, आदितश्चतुर्दशोत्तरशततमः ।
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उसकी खोज में इधर-उधर दौड़ते फिरें तो जंगल में रहने वाले राजकुमार के पक्ष के लोग उन्हें दूसरा ही रास्ता बता दें । अथवा गाड़ीवानों या गाड़ियों के झुण्ड के साथ-साथ अपने देश की ओर चला जाय ।
( १ ) यदि खोजने वाले लोग बहुत ही नजदीक आ पहुँचें तो वह किसी घने जंगल में छिप जाय । यदि छिपने लायक घना जंगल पास न हो तो हिरण्य अथवा विषयुक्त खाद्य वस्तु रास्ते के दोनों ओर डाल दें; और उस रास्ते को छोड़ कर किसी रास्ते से निकल जाय ।
( २ ) अथवा यदि वह पकड़ ही लिया जाय तो साम, दाम आदि उपायों से धोखा देकर वह उनसे भाग निकले । अथवा उन्हें विषयुक्त खाना देकर मार दे, या मूर्च्छित कर दे और स्वयं भाग जाय ।
( ३ ) पकड़े जाने के डर से छिपे हुए राजकुमार को भगा ले जाने के लिए पूर्वोक्त वारुणयोग तथा अग्निदाहों के अवसरों पर किसी के शव को वहाँ डाल कर विजिगीषु राजा, शत्रु राजा के ऊपर यह अभियोग लगाये कि उसने मेरे पुत्र को मार डाला है । इससे शत्रु राजा भागे हुए राजकुमार को खोजना बन्द कर देगा और राजकुमार बाहर निकल आवे ।
( ४ ) यदि पूर्वोक्त कोई भी उपाय न किया जा सके तो राजकुमार को चाहिए कि वह रात में पहरेदारों पर सशस्त्र हमला कर दे और उन्हें घायल कर या मार कर द्रुतगामी घोड़ों पर सवार अपने गुप्तचरों के साथ वहाँ से निकल भागे ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में सन्धिकर्म-सन्धिमोक्ष नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
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