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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 626 of 918

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Page 626

५४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) दैवतोपहारश्राद्धप्रहवणनिमित्तमारक्षिषु मदनयोग्ययुक्तमन्नपानरसं वा प्रयुज्यापगच्छेत् । आरक्षकप्रोत्साहनेन वा ।
(२) नागरककुशीलवचिकित्सकापूपिकव्यञ्जना वा रात्रौ समृद्धगृहा-ण्यादीपयेयुः । (आरक्षिणां ?) वैदेहकव्यञ्जना वा पण्यसंस्थामादीपयेयुः ।
(३) अन्यद्वा शरीरं निक्षिप्य स्वगृहमादीपयेदनुपातभयात् । ततः सन्धिच्छेदखातसुरङ्गाभिरपगच्छेत् ।
(४) काचकुम्भभाण्डभारव्यञ्जनो वा रात्रौ प्रतिष्ठेत । मुण्डजटिलानां प्रवासनान्यनुप्रविष्टो वा रात्रौ तद्व्यञ्जनः प्रतिष्ठेत । विरूपव्याधिकरणारण्यचरच्छद्मनामन्यतमेन वा । प्रेतव्यञ्जनो वा गूढैर्निह्रियेत । प्रेतं वा स्त्रीवेषेणानुगच्छेत् ।
(५) वनचरव्यञ्जनाश्चैनमन्यतो यान्तमन्यतोऽपदिशेयुः । ततोऽन्यतो गच्छेत् । चक्रचराणां वा शकटवाटैरपगच्छेत् ।

(१) अथवा देवकार्य, पितृकार्य या सहभोज के निमित्त से अन्न या पेय पदार्थों में विष मिला कर पहरेदारों पर प्रयोग कर उन्हें वेहोश बना देने के बाद राजकुमार रात के समय बाहर निकल आवे । अथवा गुप्तचर, राजकुमार को शव के रूप में अर्थी में रख कर बाहर निकल आवे । अथवा किसी मुर्दे के पीछे स्त्री का वेष बनाकर राजकुमार बाहर निकल जाय । अथवा अपनी देख-रेख में पहरेदारों को बहुत-सा धन देने की प्रतिज्ञा से उन्हें सन्तुष्ट कर राजकुमार बाहर निकल आवे ।

(२) अथवा नगर-रक्षक, नट, चिकित्सक और आपूपिक (खोमचा लगाने वाला) के वेष में रात्रि के समय इधर-उधर घूमने वाले गुप्तचर लोग रात में धनी लोगों के घर में आग लगा दें । पहरेदारों तथा व्यापारियों के वेष में दूसरे गुप्तचर भी बाजार तथा दूकानों में आग लगा दें । आग लगने के कारण जब कोलाहल या गड़बड़ हो जाय तो अवसर पाकर राजकुमार बाहर निकल जाय ।

(३) अथवा राजकुमार अपने निवास में आग लगा दे, और वहाँ किसी दूसरे की लाश डलवा दे, जिससे कि शत्रु लोग उस शव को देख कर यह समझ लें कि राजकुमार जल कर मर गया है; अथवा राजकुमार स्वयं ही किसी संधिच्छेद या सुरंग के द्वारा बाहर निकल जाय ।

(४) अथवा लकड़हारों (काचभार), कहारों (कुम्भभार) या साईसों (भाण्डभार) के वेश में राजकुमार रात को बाहर हो जाय । अथवा विजिगीषु राजा अपने मुण्ड तथा जटिलों को जब बाहर भेजे तो राजकुमार भी छिप कर उनमें जा मिले और रात में उन्हीं जैसा वेष बनाकर उनके साथ ही बाहर निकल आये । या औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा अपनी शक्लसूरत को बदल कर या रोगी का वेष बना कर या जंगली भील-कोलों का वेष बनाकर तब निश्चिन्त होकर राजकुमार अपने देश को जा सकेगा ।

(५) राजकुमार के बाहर निकल जाने पर जब विजिगीषु राजा के कर्मचारी