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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 622 of 918

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Page 622

५३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) शपथातिक्रमे महतां तपस्विनां मुख्यानां वा प्रातिभाव्यबन्धः प्रतिभूः । तस्मिन् यः परावग्रहसमर्थान् प्रतिभुवो गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते । विपरीतोऽतिसन्धीयते ।

(२) बन्धुमुख्यप्रग्रहः प्रतिग्रहः । तस्मिन् यो दूष्यामात्यं दूष्यापत्यं वा ददाति सोऽतिसन्धत्ते । विपरीतोऽतिसन्धीयते । प्रतिग्रहग्रहणविश्वस्तस्य हि परश्छिद्रेषु निरपेक्षः प्रहरति ।

(३) अपत्यसमाधौ तु । कन्यापुत्रदाने ददत्तु कन्यामतिसन्धत्ते । कन्या ह्यदायादा परेषामेवार्थाय क्लेशाय च । विपरीतः पुत्रः ।

(४) पुत्रयोरपि जात्यं प्राज्ञं शूरं कृतास्त्रमेकपुत्रं वा ददाति, सोऽतिसन्धीयते । विपरीतोऽतिसन्धत्ते । जात्यादजात्यो हि लुप्तदायादसन्तानत्वा-


बीज, चन्दन, घी, सुवर्ण और हिरण्य आदि वस्तुओं को स्पर्श करते हुए 'ये चीजें उस व्यक्ति को नष्ट कर दें, जो इस प्रतिज्ञा का अतिक्रमण करेगा' इस प्रकार शपथ लेकर सन्धि कर लेते थे ।

(१) शपथ का अतिक्रमण कर देने पर बड़े-बड़े तपस्वियों या ग्राममुख्यों को प्रतिभू बनाकर सन्धि करनी चाहिये, क्योंकि किसी भी सन्धि को बनाए रखने का दायित्व इन्हीं लोगों पर निर्भर होता है । प्रतिभू बना कर सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा विशेष लाभ में रहता है, जो प्रतिज्ञा या सन्धि तोड़ने वाले शत्रुओं को दमन करने में समर्थ व्यक्तियों को अपना प्रतिभू बनाता है । और दूसरा राजा अपने शत्रु से निश्चित ही धोखा खाता है ।

(२) किसी दूसरे से, मौखिक प्रतिज्ञा को बनाये रखने के लिए, उस व्यक्ति के भाई, बन्धु या मुख्य पुरुष को लेना प्रतिग्रह कहलाता है । इस प्रकार प्रतिग्रह के द्वारा सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा विशेष लाभ में रहता है, जो अपने राजद्रोही अमात्य या राजद्रोही पुत्र को सन्धि में देता है और दूसरा राजा ऐसी दशा में निश्चित ही धोखा खाता है । क्योंकि लेने वाला तो यह समझता है कि मेरे पास इसके अमात्य आदि हैं । वह मेरे विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता । किन्तु देने वाला, लेने वाले की दुर्बलताओं को पकड़ते ही अपने प्रतिग्रहों की अपेक्षा न करता हुआ तत्काल हमला बोल देता है ।

(३) पुत्र आदि को देकर सन्धि करने वाले राजाओं में वही राजा लाभ में रहता है, जो कि पुत्र और कन्या को दिये जाने के विकल्प में कन्या को भेज देता है, क्योंकि कन्या दाय की अधिकारिणी नहीं होती तथा दूसरों के उपभोग्य होती है, पिता के लिए क्लेश का ही कारण होती है, किन्तु पुत्र दायभागी होता है और पिता के क्लेशों को दूर करने वाला भी ।

(४) पुत्रों को देकर संधि करने वाले राजाओं में वह राजा अवश्य ही धोखा खाता है, जो कि अपने कुलीन, बुद्धिमान्, शूर, अस्त्र-शस्त्रज्ञ अथवा इकलौते पुत्र को