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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 621 of 918

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Page 621

प्रकरण १२२-१२३
अध्याय १७

सन्धिकर्म, सन्धिमोक्षश्च


(१) शमः सन्धिः समाधिरित्येकोऽर्थः । राज्ञां विश्वासोपगमः शमः सन्धिः समाधिरिति ।

(२) सत्यं शपथो वा चलः सन्धिः । प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा स्थावरः । इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । सत्यं शपथो वा परत्रेह च स्थावरः सन्धिः, इहार्थ एव प्रतिभूः प्रतिग्रहो वा बलापेक्षः ।

(४) 'संहिताः स्मः' इति सत्यसन्धाः पूर्वे राजानः सत्येन सन्दधिरे ।

(५) तस्यातिक्रमे शपथेन अग्न्युदकसीताप्राकारलोष्टहस्तिस्कन्धाश्वपृष्ठरथोपस्थशस्त्ररत्नबीजगन्धरससुवर्णहिरण्यान्यालेभिरे—हन्युरेतानि त्यजेयुश्चैनं यः शपथमतिक्रामेदिति ।


संधिकर्म और संधिमोक्ष

( १ ) 'शम', 'संधि' और 'समाधि' ये तीनों शब्द समानार्थक हैं। वह इसलिए कि इन तीनों के कारण ही राजाओं में परस्पर दृढ़ विश्वास की स्थापना होती है ।

( २ ) पूर्वाचार्यों का मत है कि 'जो सन्धि सत्य की शपथ लेकर की जाती है वह स्थायी नहीं होती है और जो सन्धि जामिन ( प्रतिभू ) रखकर अथवा राजपुत्र को बंधक ( प्रतिग्रह ) रखकर की जाती है वह स्थायी होती है।'

( ३ ) परन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को नहीं मानता है। उसका कहना है कि 'जो सन्धि सत्यनिष्ठ होकर और शपथपूर्वक की जाती है वह परम विश्वसनीय तथा स्थायी होती है, क्योंकि ऐसी सन्धि तोड़ने वालों को यह भय बना रहता है कि परलोक में नरक तथा इस लोक में बदनामी होगी। इसके विपरीत जो सन्धि जामिन ( प्रतिभू ) और बंधक ( प्रतिग्रह ) रखकर की जाती है उसको तोड़ने पर इसी लोक में थोड़ा-बहुत अनर्थ होता है, परलोक का नहीं। इसलिए उसको तोड़ने का भय बना रहता है। इसके अतिरिक्त यह सन्धि तभी निभायी जा सकती है, जब प्रतिभू बलवान् तथा प्रतिग्रह अपने दाता का प्रेमपात्र हो ।

( ४ ) प्राचीन सत्यवादी राजा लोग 'हम सन्धि करते हैं' मौखिक रूप से इतनी मात्र बात कहकर दृढ़ सन्धि किया करते थे ।

( ५ ) सच्चाई का अतिक्रमण करने पर वे लोग अग्नि, जल, भूमि, मकान, हाथी का कंधा, घोड़े की पीठ, रथ में बैठने की जगह, हथियार, रत्न, धान्य के