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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 623 of 918

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Page 623

प्र० १२२-१२३ : अ० १७ ] सन्धिकर्म और सन्धिमोक्ष ५३९

दाधातुं श्रेयान् । प्राज्ञादप्राज्ञो मन्त्रशक्तिलोपात् । शूरादशूर उत्साहशक्ति-
लोपात् । कृतास्त्रदकृतास्त्रः प्रहर्त्तव्यसम्पल्लोपात् । एकपुत्रादनेकपुत्रो
निरपेक्षत्वात् ।
(१) जात्यप्राज्ञयोर्जात्यमप्राज्ञमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तते । प्राज्ञमजात्यं
मन्त्राधिकारः । मन्त्राधिकारेऽपि वृद्धसंयोगाज्जात्यकः प्राज्ञमतिसन्धत्ते ।
(२) प्राज्ञशूरयोः प्राज्ञमशूरं मतिकर्मणां योगोऽनुवर्तते । शूरमप्राज्ञं
विक्रमाधिकारः । विक्रमाधिकारेऽपि हस्तिनमिव लुब्धकः प्राज्ञः शूरमति-
सन्धत्ते ।
(३) शूरकृतास्त्रयोः शूरमकृतास्त्रं विक्रमव्यवसायोऽनुवर्तते । कृतास्त्र-
मशूरं लक्षलम्भाधिकारः । लक्षलम्भाधिकारेऽपि स्थैर्यप्रतिपत्त्यसम्मोषैः
शूरः कृतास्त्रमतिसन्धत्ते ।


देता है। इसके विपरीत गुण वाले पुत्र को देने वाला राजा लाभ में रहता है। इसलिए समान जातीय पुत्र की अपेक्षा असमानजातीय पुत्र को देना ही अच्छा है, क्योंकि उसकी संतति दायभाग की अधिकारिणी होती है। बुद्धिमान् पुत्र की अपेक्षा बुद्धिहीन पुत्र देना इसलिए अच्छा होता है कि उसमें विवेक-विचार का महत्त्व नहीं होता है। इसलिए शत्रु को वह कोई उपयोगी सुझाव नहीं दे पाता है। शूर पुत्र की अपेक्षा भीरु पुत्र को देना इसलिए श्रेयस्कर है कि उसमें उत्साह नहीं होता है। वह न तो अपना लाभ कर सकता है और न शत्रु की हानि ही। शस्त्रज्ञ चतुर पुत्र की अपेक्षा इससे विपरीत पुत्र को देना इसलिए उचित है कि वह आक्रमण नहीं कर पाता है। इकलौते पुत्र की जगह अनेक पुत्रों में से एक को दे देना इसलिए ठीक है कि उसके बिना भी कार्य चल जाता है।

(१) कुलीन (जात्य) और बुद्धिमान् पुत्रों में से जो पुत्र जात्य, किन्तु बुद्धिहीन होता है, राजसंपति स्वभावतः उसका अनुगमन करती है। और जो पुत्र असमानजातीय किन्तु, बुद्धिमान् होता है, मंत्रशक्ति स्वभावतः उसका अनुगमन करती है। इन दोनों पुत्रों में से मंत्रशक्ति संपन्न होने पर भी अकुलीन प्राज्ञ की अपेक्षा कुलीन अप्राज्ञ ही श्रेष्ठ है; क्योंकि राज्याधिकारी होने पर वह अपने वृद्ध, अनुभवी, एवं बुद्धिमान् पुरुषों की नियुक्ति कर अपनी कमी को पूरी कर लेता है।

(२) इसी प्रकार बुद्धिमान् और शूर पुत्रों में से बुद्धिमान्, किन्तु शूरतारहित पुत्र का, बुद्धिमत्तापूर्वक किये गये कार्य अनुगमन करते हैं। बुद्धिहीन, किन्तु शूर पुत्र पराक्रम के कार्यों को कर सकता है। इन दोनों पुत्रों में से शूर; किन्तु बुद्धिहीन पुत्र के पराक्रमी होने पर भी, उसकी अपेक्षा, पराक्रमहीन बुद्धिमान् पुत्र ही श्रेष्ठ है। जैसे एक बुद्धिमान् शिकारी शक्तिशाली हाथी को अपने वश में कर लेता है वैसे ही बुद्धिमान् पुत्र अपने बुद्धिबल से शूर को भी अपने वश में कर सकता है।

(३) शूर और कृतास्त्र (शस्त्रास्त्रनिपुण) पुत्रों में शस्त्रास्त्र शून्य, किन्तु