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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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Page 611
प्रकरण ११९-१२०बलवता विगृह्योपरोधहेतवः
अध्याय १५दण्डोपनतवृत्तं च

(१) दुर्बलो राजा बलवताऽभियुक्तस्तद्विशिष्टबलमाश्रयेत, यमितरो मन्त्रशक्त्या नातिसन्दध्यात् ।
(२) तुल्यबलमन्त्रशक्तीनामायत्तसम्पदो वृद्धसंयोगाद्वा विशेषः ।
(३) विशिष्टबलाभावे समबलैस्तुल्यबलसङ्घैर्वा बलवतः सम्भूय तिष्ठेत्, यावन्न मन्त्रप्रभावशक्तिभ्यामतिसन्दध्यात् ।
(४) तुल्यमन्त्रप्रभावशक्तीनां विपुलारम्भतो विशेषः ।
(५) समबलाभावे हीनबलैः शुचिभिरुत्साहिभिः प्रत्यनीकभूतैर्बलवतः सम्भूय तिष्ठेत्, यावन्न मन्त्रप्रभावोत्साहशक्तिभिरतिसन्दध्यात् । तुल्यो-


बलवान् शत्रु और विजित शत्रु के साथ व्यवहार

( १ ) यदि कोई बलवान् राजा किसी दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो उस दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने आक्रमणकारी राजा से भी बलवान् किसी ऐसे राजा का आश्रय प्राप्त करे, जिसको कि वह आक्रमणकारी राजा भी मंत्रशक्ति आदि से फोड़ न सके ।

( २ ) यदि अनेक समान सैन्यशक्ति और मंत्रशक्ति के राजा हों तो उनमें उसी का आश्रय प्राप्त किया जाय, जिसका प्रकृतिमण्डल बुद्धिमान् हो । यदि इस तरह के भी बहुत-से राजा हों तो उनमें भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, जो अत्यन्त अनुभवी विद्वानों से युक्त हो ।

( ३ ) यदि आक्रमणकारी की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली राजा आश्रय के लिये न मिले तो विजिगीषु को चाहिए कि वह समान शक्ति वाले या समान सैन्य बल वाले अनेक राजाओं के साथ मिलकर अपने शक्तिशाली आक्रमणकारी का तब तक मुकाबला करता रहे, जब तक कि वह शत्रु उन सब मिले हुए राजाओं को मंत्रशक्ति तथा प्रभावशक्ति के द्वारा अलग-अलग न कर दे ।

( ४ ) यदि आश्रय लेने योग्य इस प्रकार के अनेक राजा हों तो उनमें से विपुलारंभ राजा का ही आश्रय प्राप्त किया जाय ।

( ५ ) यदि समशक्ति राजा भी आश्रय के लिए न मिले तो आक्रमणकारी के प्रबल विरोधी उत्साही, पवित्रहृदय, बलवान् और बहुत से हीनशक्ति राजाओं के साथ मिलकर तब तक अपने शत्रु का मुकाबला करता रहे, जब तक कि अपनी सहायता करने वाले इन राजाओं में मंत्रशक्ति तथा प्रभावशक्ति से भेद डालकर वह