कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context५२८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण ]
त्साहशक्तीनां स्वयुद्धभूमिलाभाद्विशेषः । तुल्यभूमीनां स्वयुद्धकाललाभाद्वि-
शेषः । तुल्यदेशकालानां युग्मशस्त्रावरणतो विशेषः ।
(१) सहायाभावे दुर्गमाश्रयेत, यत्रामित्रः प्रभूतसैन्योऽपि भक्तयवसेन्ध-
नोदकोपरोधं न कुर्यात्, स्वयं च क्षयव्ययाभ्यां युज्येत ।
(२) तुल्यदुर्गाणां निचयापसारतो विशेषः । निचयापसारसम्पन्नं हि
मनुष्यदुर्गमिच्छेदिति कौटिल्यः ।
(३) तदेभिः कारणैराश्रयेत—
(४) 'पाष्णिग्राहामासारं मध्यममुदासीनं वा प्रतिपादयिष्यामि ।
सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानामन्यतमेनास्य राज्यं हारयिष्यामि घात-
यिष्यामि वा । कृत्यपक्षोपग्रहेण वास्य दुर्गे राष्ट्रे स्कन्धावारे वा कोपं
समुत्थापयिष्यामि । शस्त्राग्निरसप्रणिधानैरौपनिषदिकैर्वा यथेष्टमासन्नं
(शत्रु) अपने से अलग न कर ले । यदि इस प्रकार के भी बहुत से राजा आश्रय के लिए मिलें तो उनमें से वही श्रेष्ठ है जिसके पास युद्ध के योग्य अपनी भूमि हो । यदि इस प्रकार युद्धयोग्य भूमि भी अनेक राजाओं के पास मिले तो उनमें उसी का आश्रय लेना चाहिए, जिससे अपने अनुकूल, युद्ध के योग्य समय भी मिल सके । यदि देश और काल भी अनेक के पास हों तो उनमें से उसी का आश्रय लेना चाहिए, जिसके पास विपुल युद्ध-सामग्री हो ।
(१) यदि सहायता करने वाला कोई भी राजा आश्रय के लिए न मिले तो ऐसे दुर्ग का सहारा लेना चाहिए जहाँ पर अधिक सैन्यसंपन्न शत्रु भी अपने तथा अपने पशुओं के भोजन योग्य अपेक्षित पदार्थों और इंधन, जल आदि के लिए किसी प्रकार की रुकावट न करे । उल्टे शत्रु ही का क्षय व्यय होता रहे ।
(२) यदि इस प्रकार के अनेक दुर्ग आश्रय के योग्य मिलें तो उनमें से वही दुर्ग श्रेष्ठ है, जहाँ तेल, नमक आदि नित्य वस्तुओं का अच्छा संचय हो और अवसर आने पर जहाँ से निकल जाने की भी आशा हो । क्योंकि आचार्य कौटिल्य का भी यही कहना है कि 'ऐसे ही दुर्ग का आश्रय लिया जाय, जिसमें तेल, नमक आदि नित्य सामग्री हो और जिससे भाग निकलने की संभावना हो ।'
(३) नीचे गिनाये कारणों में यदि कोई भी कारण उपस्थित हो तो दुर्ग का आश्रय लेना चाहिए । कारण इस प्रकार हैं :
(४) १. यदि विजिगीषु यह समझे कि मैं पाष्णिग्राह, मित्रबल, मध्यम अथवा उदासीन राजा को अपने शत्रु के मुकाबले में युद्ध करने के लिए खड़ा कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । २. अथवा यदि समझे कि सामन्त, आटविक या आक्रमणकारी के विरोधी उसी के किसी वंशज द्वारा उसका राज्य हरण करा लूँगा या उसको मरवा डालूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ३. अथवा यदि समझे कि आक्रमणकारी के कर्मचारियों को वश में करके उसके दुर्ग, राष्ट्र तथा उसकी छावनी में विप्लव करा