कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context५२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) परमित्रः प्रतीकारमाबलीयसं वा परेषु प्रयुञ्जीत ।
(२) एवं पक्षेण मन्त्रेण द्रव्येण च बलेन च।
संपन्नः प्रतिनिर्गच्छेत् परावग्रहमात्मनः ॥इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे हीनशक्तिपूरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः,
आदित एकादशोत्तरशततमः ।
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अपकार करने वाले, चोरों आटविकों म्लेच्छों और गुप्तचरों का अपने लाभ के लिए संग्रह करे ।
(१) शत्रुओं का बनावटी मित्र बनकर उनका प्रतीकार करता रहे, अथवा पीछे बताये गये आबलीयस अधिकरण के उपायों द्वारा शत्रुओं का प्रतीकार करता रहे ।
(२) इस प्रकार बंधु, मित्र, विद्यावृद्ध पुरुषों की संगति से तथा दुर्ग, सेतुबंध से उत्पन्न द्रव्य द्वारा और श्रेणी आदि बल से अपनी शक्ति को पूर्ण करता हुआ विजिगीषु सदैव अपने शत्रु का प्रतीकार करता रहे ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में हीनशक्तिपूरण नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।
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