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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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अंश, बलि कर, धार्मिक कर, वणिक कर और व्यावसायिक वस्तुओं के आयात-निर्यात से जो आमदनी होती थी उसको भी राजकोष में जमा कर दिया जाता था।

राजकर

हिन्दुओं की राज्य-व्यवस्था के इतिहास में राजकर का मौलिक महत्त्व माना गया है। क्योंकि राजकर का सम्बन्ध प्रजा से होता था, इस दृष्टि से राजकर को निर्धारित करने के सारे नीति-नियम यद्यपि धर्म-ग्रन्थों द्वारा निर्धारित किये जाते थे, तथापि उसको लागू करने से पूर्व उस पर समाज की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता था। इस प्रकार धर्मशास्त्र द्वारा निर्धारित और समाज द्वारा स्वीकृत जो राजकर होता था, शासन-व्यवस्था चाहे जैसी भी रहे, किन्तु राजकर के नियमों में किसी भी प्रकार का अवरोध नहीं आने पाता था। यही कारण था कि राजकर के सम्बन्ध में राजा-प्रजा के बीच कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। कई ग्रन्थों में इस प्रकार के अनेकों उदाहरण मिलते हैं कि राजकर के सम्बन्ध में जो धर्म द्वारा प्रतिपादित नियम थे, उनका अतिक्रमण करने का साहस बड़े-से-बड़े शासक भी नहीं कर सके थे।

अर्थशास्त्र के एक प्रसंग ( अर्थशास्त्र, पृ० ४१४-४१९ ) में कहा गया है कि सेल्युकस के आक्रमण के समय जब प्राप्त राजकर से कार्य न सध पाया था तो चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य ने प्रजा से धन संग्रह करने में अपना सारा बुद्धिबल लगा दिया था। इसके लिए उन्हें बड़े विलक्षण उपायों का आश्रय लेना पड़ा था। अन्त में चन्द्रगुप्त ने अपनी प्रजा से अनुग्रह की भिक्षा मांगते हुए कहा था 'आप लोग मुझ पर अपना प्रेम सूचित करने के लिए धन दें।' उसने इस विपत्ति से रक्षा के लिए देव-मन्दिरों तक से धन वसूल किया था।

राज्य की सारे आय-व्यय पर मन्त्रि-परिषद् का अधिकार होता था। राजा और राजकर के सम्बन्ध में महाभारत ( शांति० ७१।१० ) एक सुन्दर प्रसंग उपस्थित करता है। उसमें लिखा है कि 'षष्ठांश बलिकर ( आयात-निर्यात ), अपराधियों से मिलने वाला जुरमाना और उनके द्वारा अपहृत धन, जो कुछ भी न्यायतः प्राप्त हो, वह सब तुम्हारे वेतन के रूप में होगा; और वही तुम्हारी आय के द्वार या राजकर होगा।' नारदस्मृति ( १८।४८ ) में लिखा हुआ है कि 'राजाओं को पूर्व निश्चित नियमों के अनुसार जो धन प्राप्त हो और भूमि की उपज का जो षष्ठांश प्राप्त हो, वह सब राजकर होगा,