कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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और प्रजा की रक्षा करने के पुरस्कार स्वरूप वह राजा को मिलेगा।' अपनी रक्षा के फलस्वरूप प्रजा का प्रतिनिधि पुरोहित राज्याभिषेक के समय राजा से यह कहता था कि 'हम तुम्हारे निर्वाह के लिए तुम्हारा उचित अंश (भाग) तुम्हें दिया करेंगे' (शुक्रनीतिसार १।१८८)।
इन सभी उल्लेखों से हमें राजकर की सुव्यवस्था के संबंध में कितनी आस्थापूर्ण विचारधारा का पता लगता है।
राजकर सम्बन्धी नियमों के प्रसंग में दूसरी अनेक बातों के अतिरिक्त महाभारत ( १२।८८।४ ) में एक महत्त्व की बात यह कही गयी है कि 'राज-कर ऐसा होना चाहिए जो प्रजा पर भारस्वरूप सिद्ध न हो; राजा को अपना आचरण उस मधुमक्खी के समान रखना चाहिए जो वृक्षों को बिना कष्ट पहुँचाये उनसे मधु एकत्र करती है।' (अर्थशास्त्र, पृ० ४१९) कुछ निरर्थक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'जो वस्तुएँ राष्ट्र के लिए दुःखदायक हों; जो निरर्थक और केवल शोक के लिए हों; उन पर अधिक कर लगा करके उनका आयात कम करना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ४१२-४१९)। इनके अतिरिक्त कुछ पदार्थ ऐसे भी थे जिनका निर्यात वर्जित था और देश में जिनका अधिक आयात करने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था; यथा अस्त्र-शस्त्र आदि; धातु; सेना के काम में आने वाले रथ आदि अप्राप्य या दुर्लभ पदार्थ; अनाज और पशु आदि; (अर्थ-शास्त्र वही)। कुछ अवस्थाओं में विशेष कर लगाने का भी नियम था। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि जो लोग विदेश से अच्छी सुरायें आदि लाते थे अथवा घर में अरिष्ट आदि बनाते थे उन पर इतना अधिक कर लगाया जाता था जिससे राज्य में बिकने वाली ऐसी चीजों की कम बिक्री का हरजाना निकल आये (अर्थशास्त्र वही)।
आधुनिक समाजवाद
अठारहवीं शताब्दी के जितने भी महान् दार्शनिक हुए उन्होंने भी संसार की सारी वस्तुओं को विवेक की कसौटी पर परखा।
आधुनिक समाजवाद की उत्पत्ति में प्रमुख दो कारण है : एक तो पूंजी-पतियों तथा श्रमिकों का श्रेणी-विरोध और दूसरा उत्पादन में व्याप्त अराज-कता। बुद्धि और तर्क के द्वारा प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना ही समाजवादी क्रांति को जन्म देने वाले, महापुरुषों का ध्येय रहा है। समाज और राज्य का जो बासीपन था, परम्परा की जो रूढियां थीं, अंध-