कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 59 of 918
Read in context( ५५ )
त्रिवर्ग के संबंध में ही प्रकाश डाला गया है। धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों का पारस्परिक संबंध बताते हुए कौटिल्य ने यह स्वीकार किया है कि उनमें प्रमुखता अर्थ की है और शेष दोनों धर्म तथा काम, अर्थ पर ही निर्भर हैं। इसी लिए त्रिवर्ग की समुचित उपलब्धि के लिए अर्थ की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया है। यही अर्थ जब राज्यकर के रूप में या रक्षा के पुरस्कार हेतु अथवा सेवा के प्रतिदान के निमित्त शासन को प्राप्त होकर एक संरक्षित स्थान पर एकत्र कर रखा जाता है तब उसी को राजकोष के नाम से कहा जाता है।
राष्ट्र की समुन्नति और सुरक्षा के निमित्त जितने भी उपाय तथा साधन बताये गये हैं, उनमें कोष का प्रमुख स्थान है। इसी हेतु कोष-विभाग के कर्मचारियों से लेकर कोष की सुरक्षा, उसकी वृद्धि के उपाय, उसकी आय के साधन और उसके क्षय के कारणों पर कौटिल्य ने बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया है।
अर्थ-विभाग के सबसे बड़े अधिकारी को समाहर्त्ता कहा गया है। वह समाज के विभिन्न वर्गों पर, राष्ट्र की विभिन्न वस्तुओं पर, गाँवों, नगरों तथा घरों पर, व्यवसायियों तथा शिल्पियों पर और भूमि पर जो राज्यांश निर्धारित है, उसका संचय करता है तथा उसका पूरा ब्यौरा अपनी निबन्ध-पुस्तक ( Sealed Register ) में अंकित रखता है।
अर्थ-विभाग के अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों में सन्निधाता ( भंडारों का अधिकारी ), स्थानिक ( जनपद के चतुर्थांश का अधिकारी ), गोप ( गाँवों का अधिकारी ), प्रदेष्टा ( स्थानिक तथा गोप का सहायक अधिकारी ) अक्षपटलाध्यक्ष ( अकाउंट जनरल ), कोषाध्यक्ष, अर्थकारणिक ( मुख्य अकाउंटेंट ) कार्मिक ( अर्थकारणिक का अधीनस्थ कर्मचारी ), गाणनिक्य ( जिलों का हिसाब-किताब रखने वाले कर्मचारी ), सांख्यानक ( गणना करने वाले ), लेखक ( क्लर्क ), नीवीग्राहक, गोपालक, अपयुक्त, निधानक, निबंधक, प्रतिग्राहक, दायक और मंत्रिवैयावृत्यक आदि का नाम उल्लेखनीय है।
राजकोष के संचय के साधनों में, जिन्हें कि कौटिल्य ने आयशरीर कहा है, दुर्ग, राष्ट्र, खान, सेतु, वन, व्रज और वणिक्पथ प्रमुख हैं।
राज्य की आर्थिक व्यवस्था पर ही उसकी उन्नति के सभी जरिये निर्भर हैं। इसलिए राजकोष के उक्त आय-स्रोतों के अलावा अर्थदण्ड सम्बन्धी पौतवं कर ( नाप-तौल का कर ), नागरिकों द्वारा प्राप्त राज्यांश, कृषिकर, उपज का