कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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एकमात्र उद्देश्य प्रजा की भलाई या, संसार की तत्कालीन राजनीति के इतिहास में अपना अनन्य स्थान रखता है। वस्तुतः वह एक नागरिक राज्य था, जिसके प्रांतीय शासक या मांडलिक सदा ही नागरिक हुआ करते थे। इस एकराज शासन की अनेक प्रणालियाँ प्रलचित थीं जैसे राज्य, महाराज्य, आधिपत्य और सार्वभौम । सार्वभौम शासन-प्रणाली का विकास आगे चलकर चक्रवर्ती शासन-प्रणाली के रूप में प्रकट हुआ। कौटिल्य ने इसके संबंध में कहा है कि 'सारी भूमि या भारत; देश है। उसमें हिमालय से लेकर समुद्र तक सीधे उत्तर-दक्षिण एक हजार योजन में चक्रवती क्षेत्र है' ( अर्थशास्त्र, पृ० ५९० )। ये शासन प्रणालियाँ भी आगे-आगे बदलती रहीं, किन्तु उन सभी में प्रजा-कल्याण की भावना सदा ही बनी रही।
शासन-व्यवस्था
वैदिक साहित्य में हमें दो प्रकार की राजतंत्रात्मक शासन पद्धतियों के दर्शन होते हैं : नियंत्रित और अनियंत्रित । इन पद्धतियों के स्वामी ( राजा ) का यह दावा रहा है कि उसकी उत्पत्ति दैवी है, जो या तो बिना किसी प्रकार के विरोध के देश पर अधिकार कर लेता था अथवा विरोध को दबाकर बलात् सारे शासन को स्वायत्त कर लेता था। नियंत्रण की दशा में तो वह जनता की रजामंदी से ही जनता पर अधिकार करता था और दूसरी अनियंत्रित दशा में अपने बल द्वारा उस पर काबू करता था। ये दोनों प्रकार की पद्धतियाँ वंशगत थीं। अनियंत्रित राज्य बलपूर्वक भी प्राप्त किया जा सकता है ऐसा विधान हमें अथर्ववेद ( ४।२२ ) में भी देखने को मिलता है। साथ ही वैदिक ग्रन्थों में हमें यह भी देखने को मिलता है कि नियंत्रित राज्यतंत्र में राजा या तो चुना जाता है या स्वीकार किया जाता था। ( देखिए : ऋग्वेद १।२४।८; १०।१७५।१; अथर्ववेद ३।४।२ )।
तत्कालीन गण आधुनिक प्रजातंत्र के स्वरूप थे। उन गणों ( सभा या समूह ) का अध्यक्ष जनता द्वारा निर्वाचित होता था। इस प्रकार के प्राचीन गणों में शाक्य, मल्ल, विज्जी, लिच्छवी, मालव, क्षुद्रक, समवस्ताई, पहला, योधेय, कुनिन्द, शिवि, अर्जुनायन आदि प्रमुख हैं। इन सभी गणों का मुखिया ( राजा ) वंशगत होता था और उनके सार्वजनिक कार्यों का संचालन निर्वाचित सभासदों की एक कमेटी द्वारा संपन्न होता था। इनकी शासनपद्धति राजतंत्रात्मक थी; किन्तु उनकी संघ-व्यवस्था प्रजातंत्रात्मक थी। गौतमबुद्ध के समय तक अस्तित्व में आये गणों का उल्लेख रायस डेविड्स की बुद्धिस्ट इंडिया में किया गया है, जिनके नाम हैं : कपिलवस्तु के शाक्य, सुमसुकमार की