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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्राचीन भारत की एकराजत्व शासन-प्रणाली को दृष्टि में रखकर स्वभावतः होना तो यह चाहिये था कि सर्वसत्तामान शासक ( राजा ) ही सम्पूर्ण राज-सत्ता का एकाधिकारी व्यक्ति होता, किन्तु अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्र विषयक ग्रन्थों में जो नीति-नियम निर्धारित हैं उनको देखकर ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दू राजा की स्थिति एक वेतनभोगी सेवक से बढ़कर कुछ न थी। राजा और राजपरिवार का वेतन ( वृत्ति ) निर्धारित था, जो कि देश की आय तथा देश की स्थिति पर निर्भर था। राजमाता, पटरानी, दूसरी रानियां, राजकुमार और दूसरे राजपरिवार के व्यक्तियों के लिये वेतन नियत था ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ )। राजा को यद्यपि स्वामी कहा जाता था, किन्तु उसके अधिकार की सीमाएँ अपराधियों के दमन तक ही सीमित थीं। सार्वजनिक बहुमत से वह बँधा रहता था। वह पौरजानपद की राष्ट्र-संघटन की शक्ति के अधीन था। इस दृष्टि से उसकी स्थिति राष्ट्र के एक सेवक या भृत्य से बढ़कर नहीं थी। उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व और उसकी कोई व्यक्तिगत रुचि-अरुचि नहीं हुआ करती थी। हिन्दू राजा की यह दास या भृत्य जैसी स्थिति ही वस्तुतः नैतिक दृष्टि से उसे स्वामित्व के उच्चासन पर अडिग बनाये रखी रही। राज्यरूपी वृक्ष का मूल बताते हुए शुक्रनीतिसार ( ५।१२ ) में उसकी स्थिति को बड़े अच्छे ढंग से दर्शाया गया है। कहा गया है कि “राजा, राज्यरूपी वृक्ष का मूल है, मन्त्रि-परिषद् उसका धड़ या स्कंध हैं, सेनापति उसकी शाखाएँ हैं, सैनिक उसके पल्लव है, प्रजा उसके पुष्प हैं, देश की सम्पन्नता उसके फल हैं और समस्त देश उसका बीज है।”

इसलिये यदि राजा न हो तो प्रजा और राष्ट्र की क्या स्थिति हो सकती है, यह स्पष्ट हो जाता है।

हिन्दू राजनीति की दृष्टि से राज्य एक ऐसी पुनीत थाती है जो राजा को इसलिये सौंपी जाती है कि वह प्रजा की सुख-समृद्धि और कल्याण-कामना के लिए सतत यत्नशील बना रहे। प्रत्येक राज्याभिषेक के समय अभिषिक्त राजा को यह कह कर इस पुनीत थाती को सौंपा जाता था कि “यह राष्ट्र तुम्हें सौंपा जाता है। तुम इसके संचालक, नियामक और उत्तरदायित्व के दृढ़ वाहन-कर्ता हो। यह राज्य तुम्हें कृषि के कल्याण, सम्पन्नता, प्रजा के पोषण के लिए दिया जाता है ( शुक्लयजुर्वेद ९।२२ )।

इसलिये राजा के लिये पहिली प्रतिज्ञा राष्ट्रहित और प्रजा की हित-कामना की हुआ करती थी। हिन्दुओं की एकराजता का यह महान आदर्श, जिसका