कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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पहाड़ियों के भाग, अलकप्पा के बुली, केशपट्ट के कलामा, रामगांव के कालया कुशीनगर के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मौर्य, विमिथा के विदेह और वैशाली के लिच्छवी या विज्जी। इन प्रजातन्त्रात्मक गणराज्यों का संचालन प्रौढ़ों की एक राजसभा, एक सार्वजनिक सभा ( संघ ) और ग्रामीणों की पंचायत द्वारा हुआ करता था। सारे शासन का आधार ग्राम्यसंगठन था। ग्राम का मुखिया ( ग्रामीण ) ही कर के भुगतान तथा ग्राम सम्बन्धी दूसरे शासन-प्रबंधों के लिए उत्तरदायी समझा जाता था। एक प्रबंधक के नियंत्रण में पाँच से दस गाँव तक होते थे। इसे गोप ( जिला ) कहा गया है। इसी प्रकार के चार ग्राम-समूहों ( गोपों ) का समूह-पति होता था, जिसके शासक को स्थानिक और उसके ऊपर का शासक नागरिक नाम से कहा जाता था। नागरिक अर्थात् राजधानी का प्रमुख। इन सबके ऊपर देख-रेख के लिए जिस अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी उसको समाहर्ता कहा जाता था। ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ९९-१०२ ) ।
शासन-व्यवस्था के प्रसंग में कौटिल्य ने नगर की व्यवस्थापिका सभा ( नगर पालिका ) का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है। उसके छह विभाग बताये गये हैं। प्रत्येक विभाग का संचालन पाँच सदस्यों के हाथ में हुआ करता था। एक विभाग का कार्य कारीगरों ( कलाकारों ) की निगरानी करना था; दूसरे विभाग के हाथ में विदेशियों की देखरेख तथा उनके आवास आदि की व्यवस्था थी; तीसरा विभाग जनगणना, स्वास्थ्य तथा आय-व्यय से संबंधित था; चौथा विभाग मुद्रा तथा विनिमय, तौल, चुंगी, पासपोर्ट आदि का कार्य करता था; पाँचवां विभाग निर्मित वस्तुओं की निगरानी के लिये नियुक्त था; और छठा विभाग केवल कर-वसूली का था।
विभागीय अध्यक्ष : धर्म और शासन के क्षेत्र के कार्य करने वाले जिन प्रमुख विभागीय अध्यक्षों का कौटिल्य ने (अर्थशास्त्र, पृ० ३३) उल्लेख किया है, उनकी सूची डा० जायसवाल ने ( हिन्दू राज्यतंत्र, भाग २; पृ० २६१-२६२ ) इस प्रकार दी है :
१. मंत्री
२. पुरोहित
३. सेनापति—सेना-विभाग का मंत्री
४. युवराज
५. दौवारिक—राजप्रासाद का प्रधान अधिकारी
६. अंतर्वंशिक—राजवंश के गृहकार्यों का प्रधान अधिकारी