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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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शौर्य, अमर्ष, शीघ्रता और दक्षता, ये चार बातें उसके उत्साह में होनी चाहिये, इन बातों के साथ-साथ उसमें वे सभी बातें भी होनी चाहिए, जिनके कारण वह विराट् प्रजा के उच्चादर्शों को जान सके और अपने उन्नत गुणों को प्रजा में क्रियान्वित कर सके । राजा के चरित्र की यह सम्पदा ( पूंजी ) है ।

राजा के सदाचरण पर कौटिल्य ने बड़ा जोर दिया है । अपने आचरण को विशुद्ध बनाये रखने के लिए राजा को जितेन्द्रिय होना चाहिए; उसको वृद्धजनों का सहवास करना चाहिए; उसको परस्त्री, परधन और हिंसा आदि कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए; अधिक शयन करना तथा लोभ, मिथ्या-व्यवहार, उद्धतवेष एवं अनर्थकारी कार्यों को त्याग देना चाहिए; अधर्मकारी तथा अनर्थकारी कार्यों से उसको दूर रहना चाहिए; धर्म और अर्थ को क्षति न पहुँचाने वाले काम का सेवन करना चाहिए; यदि वह धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में से किसी एक का अधिक सेवन करता है तो अपने लिए वह नाशकारी अनर्थ को पैदा करता है ।

कौटिल्य का सुझाव है कि राजा के आचरण पर ही उसके कर्मचारियों का आचरण निर्भर है । यदि वह प्रमादी होगा तो उसके कर्मचारी भी प्रमाद करने लगेंगे और यह भी असंभव नहीं कि प्रमादी राजा के कर्मचारी उसके शत्रु से सन्धि करके एक दिन उसका सर्वस्व ही समाप्त कर डालेंगे । इसके विपरीत यदि राजा उदार, परिश्रमी और विवेकशील होगा तो उसका सारा भृत्यवर्ग उसके इन गुणों को अपनायेगा । इसलिए, कौटिल्य का कहना है कि, उक्त बातों पर ध्यान रखकर राजा को चाहिए कि यत्नपूर्वक सावधानी से वह अपनी उन्नति की ओर सचेष्ट रहे ।

ऐसा तभी सम्भव है यदि उसकी कार्य-व्यवस्था का ढंग निश्चित रूप से विचारपूर्वक संपन्न होता रहे । राजा की कार्य व्यवस्था नियमित ढंग से संचालित होती रहे, इसके लिए कौटिल्य ने रात और दिन को दो भागों में विभक्त कर प्रत्येक भाग को आठ-आठ उप-भागों में बाँट दिया है । ब्राह्ममुहूर्त में उठने के बाद रात्रि में शयनपर्यन्त राजा को किस समय क्या कार्य करना चाहिए, इसका कौटिल्य ने ब्योरेवार विवरण दिया है ।

राजा के प्रमुख कर्तव्य हैं यज्ञ, प्रजापालन, न्याय, दान, शत्रु-मित्र से उचित व्यवहार, विभिन्न विषयों के प्रकांड विद्वानों को उनके उपयुक्त स्थानों पर नियुक्त करना । ( अर्थशास्त्र, पृ० ६३-६४ ) इसी को अच्छी नीति (सुशासन) कहा गया है और ऐसी नीति के अनुसार आचरण करने वाले राजा की सभी विघ्न-बाधायें दूर होकर उसकी उन्नति एवं कल्याण होता है ।