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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। कौटिल्य की विवेचन-प्रणाली से हमें यह भी विदित होता है कि मन्त्रिपरिषद् के निर्णय बहुमत पर आधारित थे। बहुमत द्वारा स्वीकृत-समर्थित कार्यों को ही कौटिल्य ने क्रियान्वित करने का विधान किया है।

राजा : कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' और उसके जीवन-सम्बन्धी ध्येयों का अध्ययन कर यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ जाती है कि कौटिल्य का उद्देश्य एक ऐसे विराट् साम्राज्य की स्थापना करना था, जिसकी शासन-सत्ता निरंकुश हो और जिसके अतुल बल-वैभव के समक्ष किसी को भी शिर उठाने का साहस न हो, फिर भी उसकी नीति के अन्तराल में लोक-कल्याण की एक व्यापक भावना विद्यमान थी, जिसका उल्लंघन उसने कभी भी नहीं किया और सम्भवतः यही एक भारी कारण रहा कि कौटिल्य की निरंकुश नीति में प्रजातन्त्री विचारों का आश्चर्यमय समन्वय था।

कौटिल्य का निर्देश है कि राजा का पहिला कर्त्तव्य प्रजा को प्रसन्न रखना है। वस्तुतः राजा नाम की कोई हस्ती ही कौटिल्य के सामने नहीं दिखाई देती है; प्रजा ही सब कुछ है। राजा का अपना कोई हित या सुख अथवा अभीष्ट नहीं होना चाहिए। वह तो प्रजा की सुख-सुविधाओं एवं प्रजा के अभीष्टों की व्यवस्था करने वाला एक व्यवस्थापक मात्र है। उस विराट् प्रजा के कुशल-क्षेम के लिए किन-किन बातों और किन-किन साधनों की आवश्यकता है, इसकी सारी जिम्मेदारी और सारा भार राजा के ऊपर निर्भर है। (अर्थशास्त्र पृ० ६२-६३) कदाचित् इसी लिए विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नाटक में एक बार चन्द्रगुप्त अपने परतन्त्र जीवन के लिए इतना झुंझला पड़ता है कि सारा राजपाट छोड़ देने के लिए वह उत्तेजित हो उठता है।

इसलिए राजा के चारित्रिक गुणों के सम्बन्ध में कौटिल्य ने जो सीमाएँ निर्धारित की हैं, उन तक पहुँचना प्रत्येक व्यक्ति के वश की बात नहीं है। सत्कुलोत्पन्न, दैवबुद्धि, बलवान्, धार्मिक, सत्यवादी, तत्त्ववक्ता, कृतज्ञ, उच्चादर्श-युक्त, उत्साही, शीघ्र कार्य करने वाला, समर्थ सामंतों से युक्त, दृढ़निश्चयी और विद्या-व्यसनी; राजा के चरित्र के ये प्रधान गुण हैं। (अर्थशास्त्र, पृ० १८) इनके अतिरिक्त उसकी बुद्धि में शास्त्रों को सुनने की उत्कण्ठा, शास्त्रोपदेश को ग्रहण करने की क्षमता, तदनुसार आचरण करने का संयम और तर्क-वितर्क के द्वारा तत्त्व की बात को जान लेने की निपुणता होनी चाहिए।