कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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मल्लों के बृहद् संस्थागार ( सार्वजनिक भवन—House of Communal Law ) का उल्लेख महापरिनिब्बान सुत्त ( ६।२३ ) में हुआ है। इसमें लिखा गया है कि बुद्ध भगवान् के निर्वाण की सूचना देने के लिए आनंद जब मल्लों के यहाँ पहुँचा तो उस समय उक्त संस्थागार में मल्ल लोग एकत्र होकर उसी विषय पर विचार कर रहे थे। जैनों के ‘कल्पसूत्र’ ( पृ० १२८ ) से विदित होता है कि विदेहों और लिच्छवियों ने एक संयुक्त लीग की स्थापना की थी, जिसमें नौ सदस्य मल्लों के थे।
लिच्छवियों के प्रसंग में पहिले बताया गया है कि वे मल्लों के पड़ोसी थे। मल्लों को महापरिनिब्बान सुत्त ( ५।१६ ) में वाशिष्ठ कहा गया है, जो आर्यों का एक प्रसिद्ध गोत्र था। डा० जायसवाल का कहना है कि मौर्य राज्य की स्थापना के बाद मल्लों की प्रजातंत्र शासन-प्रणाली समाप्त हो चुकी थी, किन्तु ११वीं शताब्दी तथा उसके बाद तक तिरहुत तथा नेपाल में उनके भिन्न-भिन्न वंश प्रतिष्ठित-प्रकाशित होते रहे। गोरखपुर और आजमगढ़ में आज भी मल्लों के वंशज बचे हुए हैं, जो कि व्यापार आदि से जीविकोपार्जन करते हैं हिन्दू-राजतंत्र भाग १, पृ० ७७)।
मद्रक : मद्रकों का इतिहास बहुत प्राचीन है। यजुर्वेद ( १५।११।१३ ) और ऐतरेय ब्राह्मण ( ८।१४ ) में जिस प्रजातंत्री शासन-प्रणाली का उल्लेख मिलता है, उसमें उत्तर मद्र और उत्तर कुरु भी सम्मिलित हैं। पाणिनि की अष्टाध्यायी में मद्रों का उल्लेख दिशा के विचार से हुआ है, जिससे प्रतीत होता है कि उनके शासन के दो विभाग थे। (अष्टाध्यायी ४।२।१०८, ७।३।१३)। एक गुप्तकालीन शिलालेख (फ्लीट : गुप्त इन्सक्रिप्शन्स, पृ० ८) से विदित होता है कि पाणिनि के समय में मद्र लोगों की प्रजातंत्र शासन-प्रणाली प्रचलित थी और उनकी यह स्थिति लगभग चौथी शताब्दी ई० पूर्व तक बनी रही, मद्रों के दो कुल थे : एक तो उत्तर में और दूसरा दक्षिण में। दोनों की शासन-प्रणाली भिन्न-भिन्न थी। इस संबंध में हमें यह भी पता चलता है कि उत्तर-कुरुओं के प्रकाश में आने तक उत्तर मद्रों का अस्तित्व पौराणिक कोटि में चला गया था। उनका वैभव अब कथा-कहानियों भर में ही रह गया था। (मिलिंदपञ्ह, खंड १, पृ० २-३)।
महाभारत (कर्णपर्व, अध्याय ११, ४४) से हमें पता चलता है कि उत्तर मद्रों की राजधानी शाकल (संभवतः स्यालकोट) थी। उन्होंने शाकल के आसपास के प्रदेश का नाम अपने नाम पर मद्र रख छोड़ा था। मिलिंदपञ्ह के उल्लेखानुसार दूसरी शताब्दी ई० पूर्व में उक्त शाकल नगर मिनेडर