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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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वृज्जी : अर्थशास्त्रकार ने जहाँ वृज्जियों का उल्लेख किया है, वहाँ विदेहों को ही लिया है। पाणिनि ने वृजिक और मद्रक शब्दों के लिए जो अर्थ दिया है (अष्टाध्यायी ४।२।१३१) उसी को अर्थशास्त्रकार ने भी ग्रहण किया है। कात्यायन ने भी मद्रों और वृजियों के प्रजातन्त्री उदाहरण दिये हैं; अर्थात् मद्र का भक्त (राजभक्त) मद्रक और वृजी का भक्त वृजिक कहा जायेगा (अष्टाध्यायी वार्तिक ४।३।१००; महाभाष्य, ४।२।४५; ५।३।५२) कौटिल्य ने ऊपर राजशब्दोपजीवी संघों में मद्रक और वृजिक रूपों का ही उल्लेख किया है। वृजियों की शासन-प्रणाली कुलिक (उच्चकुलोत्पन्न) आधार पर थी। उसके न्यायालय के तीन प्रमुख अधिकारी हुआ करते थे। सेनापति, उपराज और राजा। वृजि लोग दाक्षिणात्य थे।

वृजियों के संबंध में हमें बौद्ध ग्रन्थ 'दीघनिकाय' में पुष्कल सामग्री देखने को मिलती है। प्रसंग ऐसा है कि एक समय मगध के राजा की ओर से उसका महामन्त्री भगवान् बुद्ध के पास इस आशय की एक जिज्ञासा लेकर आया कि वज्जियों (वृजियों), लिच्छवियों और विदेहों पर उसे आक्रमण करना चाहिए या नहीं। उसके उत्तर में बुद्ध ने अपने शिष्य आनन्द को सम्बोधित करते हुए वृजियों के संबंध में सात प्रश्न किये थे। इन सात प्रश्नों में उन्होंने वृजियों की शासन-प्रणाली और उनके सुदृढ़ संघटन पर प्रकाश डाला है। (डाइलाग्स आफ दि बुद्धा, भाग २, पृ० ७६-८५; सेक्रेड बुक्स आफ दि ईस्ट, भाग ११, पृ० ३-६; हिन्दू-राजतन्त्र, भाग १, पृ० ५९-६१)।

मल्ल : लिच्छवियों और वृजियों की ही भाँति मल्लों का उल्लेख भी विभिन्न ग्रन्थों में पाया जाता है। मज्झिमनिकाय में संघों और गणों के प्रसंग में कहा गया है कि "हे गोतम, यह बात संघों और गणों के सम्बन्ध में है; जैसे वज्जि और मल्ल" (मज्झिमनिकाय १।४।५।३५)। एक जैन-ग्रंथ में गण शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि गण मनुष्यों का वह समूह है जिसका मुख्य गुण मनयुक्त (सचित्त) अथवा विवेक युक्त होता है; जैसे मल्लों का गण (अभिधानराजेन्द्र, खण्ड ३, पृ० ८१२)।

प्रो० रायस डेविड्स तथा डा० जायसवाल का अभिमत है कि मल्लों का राज्य बहुत विस्तृत था। उसका विस्तार गोरखपुर जिला से पटना तक फैला हुआ था। वह दो भागों में विभक्त था, जिसमें एक की राजधानी कुशीनगर और दूसरे की पावा में थी। डायलाग्स आफ दि बुद्धा, भाग २, पृ० १७९—१७९०; हिन्दू-राजतंत्र, भाग १, पृ० ६२) राजनीतिक दृष्टि से वृजियों और मल्लों, दोनों का प्राचीन भारत के संघ राज्यों में सर्वोच्च स्थान था।