Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 29 of 918

Read in context
Page 29

( २५ )

तक था। ऐसे जनतंत्र राज्यों में शाक्य, कोलिय, लिच्छिवी, विदेह ( वृजी ), मल्ल, मोरिय, बुली और मग्ग का नाम उल्लेखनीय है ( —डेविड्स का अनुवाद—महापरिनिब्बान सुत्तन्त, पृ० ६, २१-२७; Dialogues of the Buddha, पृ० २, १७६-६०; Buddhist India, पृ० २२-२३ )।

मेगस्थनीज, एरियन और कर्टियस आदि यूनानी विद्वानों ने भारतीय प्रजातंत्रों के सम्बन्ध में अपनी आँखों देखा प्रामाणिक वृत्तांत दिया है। उन्होंने तत्कालीन भारतीय राज्य-व्यवस्था के दो रूप बताये हैं : एक तो वह जिसमें एकराजस्व शासन प्रणाली प्रचलित थी और दूसरा वह जिसमें प्रजातन्त्र शासन प्रणाली वर्तमान थी। इस प्रकार की शासन प्रणाली वाले तत्कालीन संघ-राज्यों, स्वतंत्रसंघों और राजाधीन गणतन्त्रों में यूनानी इतिहासकारों ने कथई ( कठ ), अद्रेस्तई, सोभूति, क्षुद्रक, मालव, शिवि, अग्रश्रेणी, आर्जुनायन, अंबष्ठ, क्षत्रिय, मुसिकनि, ब्रचमनोई, पटल, फेगेल ( भगल ), योधेय, अरट्ट, श्येड, गोपालव और कोंडिवृषस् आदि की नामावली तथा उनका इतिहास, अथ च उनमें से अधिकांश राज्यों के साथ हुए युद्धों का वर्णन दिया है। ( मेगस्थनीज, एरियन १२; एरियन : अनाबेसिस, ५, २२, २ ए; इन्वेजियन ऑफ इंडिया बाई अलेक्जेंडर दि ग्रेट; कर्टियस भाग ६, प्रक० ४; डॉ० जायसवाल : हिन्दू-राजतन्त्र १, पृ० ८३-१०८ )।

ऊपर कहे गये इतने अधिक संघराज्यों या गणराज्यों की उपलब्धि से हमें विदित होता है कि प्राचीन भारत में अनेक प्रकार की शासन-प्रणालियां प्रचलित थीं। प्राचीन भारत की प्रजातन्त्रीय शासन-प्रणाली के परिचायक उक्त राज्यों के सम्बन्ध में हमें संस्कृत-साहित्य और पुरातत्त्व में प्रचुर सामग्री देखने को मिलती है। इन विभिन्न शासन-प्रणालियों का स्वरूप-दर्शन, भोज्य शासन-प्रणाली, द्वैराज्य शासन-प्रणाली, अराजक शासन-प्रणाली, उग्र शासन-प्रणाली और राजन्य शासन-प्रणाली आदि में किया जा सकता है।

शक्तिशाली मौर्य साम्राज्य की प्रतिष्ठा हो जाने के बाद यद्यपि बहुत-से पुराने प्रजातन्त्र मौर्य राजाओं की नीति की लपेट में आकर मौर्य साम्राज्य में विलयित हो चुके थे, कुछ को सर्वथा नष्ट किया जा चुका था; फिर भी कुछ सुदृढ़ संघात राज्य बच गये थे, जिनका अस्तित्व शुंगकाल में तथा उसके बाद तक बना रहा। ऐसे संघातों में योधेय, मद्र, मालव, क्षुद्रक, शिवि, आर्जुनायन, वृष्णि, राजन्य, महाराज, जनपद, वामरथ, शालंकायन और औदुम्बर आदि का नाम उल्लेखनीय है।