कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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डा० जायसवाल ने, प्राचीन भारत में प्रतिष्ठित ८२ प्रजातंत्रों की नामावली दी है ( हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० २६७-२७०, परिशिष्ट ख ), जिससे भारतीय जन-जीवन में प्रजातन्त्र के प्रति अदम्य निष्ठा और आत्मोन्नयन के लिए अडिग आस्था का पता चलता है ।
जिन इतिहासकारों का यह कहना है कि भारत में प्रजातन्त्र की स्थापना अधिक प्राचीन नहीं है उनको भारतीय इतिहास की जानकारी नहीं है । वास्तविकता यह है कि जिस युग के भारत में अनेक प्रकार की शासन-प्रणालियाँ प्रचलित हो चुकी थीं, उस समय तक योरप के अनेक देशों में शासन-सूत्र का आरम्भ हो ही रहा था । जहाँ तक प्रजातन्त्रात्मक शासन का प्रश्न है इसकी स्थापना तो वहाँ और भी बाद में हुई ।
**संघात राज्य—**आचार्य कौटिल्य ने संघात राज्यों की शासन-प्रणाली और उनके संघटन के सम्बन्ध में अनेक बातें बतायी हैं । महाबलशाली मौर्य साम्राज्य की एकराज शासन-व्यवस्था में अपने अस्तित्व को बनाये रखने की शक्ति इन्हीं संघात राज्यों में पायी गयी । ये संघात प्रजातन्त्र के पोषक थे और उन्होंने एकराज शासन का सदा बहिष्कार किया । इन प्रजातन्त्रवादी संघातों को वश में करने के लिए कौटिल्य ने साम और दान नीति को उपयुक्त बताया है; क्योंकि शक्ति और संघटन की दृष्टि से वे इतने शक्तिशाली होते थे कि उनको जीतना सर्वथा असंभव था ।
कौटिल्य का सुझाव है कि "किसी संघ को प्राप्त करना, जीतना, मित्रता संपादित करने या सैनिक सहायता प्राप्त करने की अपेक्षा अधिक उत्तम है । जिन्होंने मिलकर अपना संघ बना लिया हो, उनके साथ साम और दान की नीति का व्यवहार करना चाहिए; क्योंकि वे अजेय होते हैं । जिन्होंने अपना इस प्रकार का संघ न बनाया हो, उन्हें दण्ड और भेद की नीति से जीतना चाहिए ।" ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६८ )
इस विवरण से प्रतीत होता है कि जो गण या प्रजातन्त्र राज्य बलवान् होते थे और मिलकर अपना संघात बना लेते थे, मौर्यों की एकराज व्यवस्था में भी वे स्वच्छंद रूप से रहते थे, किन्तु संघातरहित राज्य भेद या दण्ड से वश में किये जा सकते थे । यह भी पता चलता है कि उन संघबद्ध गणों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता था और आवश्यकता होने पर साम-दान के द्वारा उनसे मित्रता गाँठकर उनसे सैनिक सहायता भी प्राप्त की जाती थी । अशोक के शिलालेखों में पाये जाने वाले योन, कंबोज, गांधार, राष्ट्रिक, पितिनिक, नामक-भोज, आंध्र और पुलिंद आदि ऐसे ही अंतर्भुक्त