कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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वाले राजशब्दोपजीवी दूसरे संघों का भी उल्लेख किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६९ ) । डा० जायसवाल ने उक्त संघों के संबंध में कहा है कि "यदि हम उपजीवी शब्द को 'मानना' या 'धर्म आदि का पालन करना' इस अर्थ में लें तो इससे यह भाव निकलता है कि जो संघ शस्त्र-अस्त्र का व्यवहार करने अथवा युद्धकला में निपुण हुआ करते थे, वे शस्त्रोपजीवी कहलाते थे, और जो संघ राजशब्दोपजीवी कहलाते थे, उनके शासक राजा की उपाधि धारण करते थे। यही बात हम दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि शस्त्रोपजीवी संघों में जो लोग होते थे, वे सब युद्धों में बहुत निपुण हुआ करते थे और राजशब्दोपजीवी संघों के शासक या प्रधान सदस्य राजा की उपाधि धारण करते थे" ( हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० ४४, ८१-८२ ) । इस दृष्टि से पाणिनि द्वारा प्रोक्त आयुधजीवी संघों का अभिप्राय युद्धकलाविशारद होना ही युक्तिसंगत जान पड़ता है ।
वैयाकरण पाणिनि ने तत्कालीन प्रजातंत्र के परिचायक ६ समाजों का उल्लेख किया है, जिनके नाम हैं ( १ ) मद्र, ( २ ) वृजि ( अष्टाध्यायी ४।२।१३५ ), ३. राजन्य ( ४।३।५३ ), ४. अंधकवृष्णी ( ६।२।३४ ), ५. महाराज और ६. भर्ग (४।३।९७) । इन सभी समाजों में प्रजातंत्र शासन प्रणाली प्रचलित थी ।
बुद्धकालीन धार्मिक संघ भारतीय साहित्य और पुरातन भारतीय राजनीति, दोनों के लिए महान देन छोड़ गये हैं । इन भिक्षुसंघों की रचना यद्यपि धार्मिक भावना के आधार पर हुई थी; किन्तु उनका संचालन एवं संघटन अपने समकालीन राजनीतिक संघों की प्रणाली पर सम्पन्न होता था; और वे इतने सफल सिद्ध हुए कि अल्पकाल में ही उनकी बहुश्रुति एवं लोकप्रियता धरती के कोने-कोने तक फैल गयी । उनके द्वारा एक ओर तो मानव जाति की शांति तथा प्रेम की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ और दूसरी ओर सामाजिक अभ्युन्नति के क्षेत्र में प्रजातंत्र की भावना को अधिक उभरने के लिए बल मिला । इस सम्बन्ध में डा० जायसवाल का कहना है कि "बौद्धसंघ के जन्म का इतिहास सारे संसार के त्यागियों के सम्प्रदायों के जन्म का इतिहास है । इसलिए भारतीय प्रजातंत्र के संघटनात्मक गर्भ से बुद्ध के धार्मिक संघों के जन्म का इतिहास केवल इस देश वालों के लिए ही नहीं; बल्कि सारे संसार के लिए भी विशेष मनोरंजक है" ( हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ. ६१ ) ।
बौद्धकालीन प्रजातंत्र राज्यों का विस्तार पूर्व में गोरखपुर तथा बलिया के जिलों से भागलपुर जिले तक और मगध के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण