कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 27 of 918
Read in context( २३ )
संघ शब्द से राज्य का अर्थ लिया जाता था। संघ उसे इसलिए कहा गया है, क्योंकि वह एक संस्था या एक समूह था ( महाभाष्य ५।१।५९ ) ।
कुछ दिन पूर्व मोनियर विलियम, डा० फ्लीट, डा० थामस और डा० जायसवाल आदि विद्वानों में 'गण' शब्द की प्राचीनता तथा उसके उपयुक्त अभिप्राय को सिद्ध करने के लिए बड़ा विवाद रहा। मोनियर विलियम्स और डा० फ्लीट ने गण को ट्राइब ( Tribe ) के अर्थ में ग्रहण किया था, जिसका प्रतिवाद डा० जायसवाल ने और उनकी प्रेरणा से डा० थामस ने किया ( जर्नल, रायल एशियाटिक सोसाइटी, १९१४, पृ० ४१३, १०१०; १९१५, पृ० ५३३; १९१६, पृ० १६२ ) ।
गण शब्द का उपयुक्त अभिप्राय जानने के लिए जातक, महाभारत, धर्म-शास्त्र, अमरकोश, अवदानशतक और जैनग्रन्थों में बिखरी हुई प्रचुर सामग्री देखने योग्य है ( हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० ३५-३७ ) । इन सभी ग्रन्थों में गण शब्द प्रजातंत्र का ही बोधक है।
प्राचीन भारत के संघराज्यों तथा गणराज्यों के संबंध में वैयाकरण पाणिनि ( ५०० ई० पूर्व ) ने बहुत सी बातें बतायी हैं। पाणिनि के मत से संघ शब्द राजनीतिक संघों की या गणों अथवा प्रजातंत्रों की प्रकृति को प्रकट करने वाला एक पारिभाषिक शब्द है। पाणिनि यद्यपि धार्मिक संघों से परिचित था; किन्तु उसने कहीं भी जैन-बौद्ध संघों का निर्देश नहीं किया। इसका अभिप्राय यही हो सकता है कि या तो वह जैन-बौद्धों के संघों से परिचित न था या तब तक वे संघ प्रकाश में नहीं आये थे। यही बात कात्यायन ( ४०० ई० पूर्व ) के दृष्टिकोण से भी प्रकट होती है। पाणिनि और कात्यायन ने वाहीक ( वाहीक देश का अर्थ है नदियों का देश। यह शब्द 'वह' धातु से निकला जान पड़ता है, जिसका अर्थ 'बहना' है। वाहिनी का एक अर्थ नदी भी होता था। इस वाहीक देश के अंतर्गत सिंध और पंजाब दोनों थे-डा० जायसवाल : हिन्दू-राजतंत्र, १, पृ० ४६ तथा फुटनोट; सिल्वेन लेवी : इण्डियन एंटीक्वेरी, भाग ३४, पृ० १८ ( १९०६ ) ; महाभारत, कर्णपर्व ४४।७ ।) देश के कुछ संघों का उल्लेख किया है ( क्रमशः अष्टाध्यायी ५।३।११४-११७, वार्तिक ४।१।१६८ ) जिससे प्रतीत होता है कि उन प्रजातंत्रमूलक संघों के सदस्य ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा दूसरी जातियों के लोग भी हो सकते थे। पाणिनि ने उक्त संघों को आयुधजीवी अर्थात् 'आयुध के द्वारा अपनी जीविका का निर्वाह करने वाले' बताया है। कौटिल्य ने उक्त संघों को शस्त्रोपजीवी ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६९ ) कहा है। कौटिल्य ने शस्त्रोपजीवी संघों के विपरीत भाव रखने