कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
वपयेन्द्रं यजते ॥६॥ अनुबद्धशिरःपादेन गोशालां चर्म-
णावच्छाद्यावदानकृतं ब्राह्मणान् भोजयति ॥१०॥ प्रोष्य
समिध आदायोर्जं बिभ्रदिति गृहसङ्काशे जपति ॥११॥
सव्येन समिधो दक्षिणेन शालावलीकं संस्तभ्य जपति
॥१२॥ अतिव्रज्य समिध आधाय सुमङ्गलि प्रजावति
सुसीमेऽहं वां गृहपतिर्जीव्यासमिति स्थूणे गृह्णात्यु-
पतिष्ठते ॥१३॥ यद्वदामीति मन्त्रोक्तम् ॥१४॥ गृहप-
त्न्यासाद् उपविश्योदपात्रं निनयति ॥१५॥ इहैव स्तेति
प्रवत्स्यन्नवेक्षते ॥१६॥ सूयवसादिति सूयवसे पशून्निष्ठा-
पयति ॥१७॥ दूर्वाग्रैरञ्जलावप आनीय दर्शं दाशर्भि-
गौओं में जो सबसे बली हो उसकी वपा से 'वृषभेन्द्र की'पूजा करे वशा
विधान की रीति से ॥९॥ शिर पैर को बान्धकर गोशाला में धर कर चमड़े
से ढक देवे ॥ और टुकड़े २ करके ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥१०॥
भूमि को प्रोक्षण कर समिध लाकर "ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मंत्र का जप
करे । अर्थात् जहाँ २ देशान्तर में जाकर जंगल से समिधाओं को लाकर
जहाँ २ घर में मिले वहाँ २ उक्त मंत्र का जप करे और समिदाधान करे
और मकान के छप्पर को छूकर"ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मन्त्र का जप करे
॥११॥ बाँये हाथ से समिधा को एवं दहिने से मकान के छप्पर को
स्पर्श कर मंत्र का जप करे ॥१२॥ बहुत दूर जाकर समिदाधान कर
"सुमङ्गलि०" इत्यादि से घर के स्थूणा को पकड़ कर उपस्थान करे ॥
"यद्वदामि०" से घरवालों से प्रियवचन बोले ॥१४॥ और घर के
स्वामिनी के रंधन गृह में बैठ कर जलपात्र को लावे ॥१५॥ उपवास
किया हुआ "इहैव स्त०" से घर और मनुष्यों को देखे ॥१६॥ "सूयव-
सात्" से सूयवस पशुओं को स्थिर करे ॥१४॥ यजमान के गृहप्रवेश
कर्म को कहते हैं ॥ यजमान मौन होकर समिदाधान करके घर को
देख कर "ऊर्जं बिभ्रत्"८ छः ऋचावाले सूक्त का जप करे । वाम हाथ से
समिधाओं को लेकर दहिने से शाला के छप्पर को स्पर्श कर"ऊर्जंबिभ्रत्०"
सूक्त का अप करे । तब अग्नि में समिध डाले । और "सुमङ्गलि०"