कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५१
लोहितं निर्मृज्य रसमिश्रमश्नाति ॥१५॥ सर्वमौदुम्बरम्
॥१६॥ यस्येदमा रज इत्यायोजनानामप्ययः ॥१७॥६॥२३॥
उच्छ्रयस्वेति बीजोपहरणम् ॥१॥ आज्यमिश्रान्य-
वानुर्वरायां कृष्टे फालेनोडुह्यान्वृचं काशीन्निनयति निव-
ति ॥२॥ अभि त्यमिति महावकाशेऽरण्य उन्नते विमिते
प्राग्द्वारप्रत्यग्द्वारेष्वप्सु सम्पातानानयति ॥३॥ कृष्णा-
जिने सोमांशून् विचिनोति ॥४॥ सोममिश्रेण सम्पात-
वन्तमश्नाति ॥५॥ आदीप्ते सम्पन्नम् ॥६॥ तां सवित-
रिति गृष्टिदाम बध्नाति ॥७॥ सं मा सिञ्चन्त्विति सर्वो-
दके मैश्रधान्यम् ॥८॥ दिव्यं सुपर्णमित्यृषभदण्डिनो
इक्षु काश के कण्डी से रुधिर का मार्जन कर उसमें रस मिला कर पान
करावे ॥१४॥१५॥ इन कर्मों को गूलर के काठ से करे ॥१६॥ “यस्येदमा
रज०” इत्यादि से यज्ञ सम्बन्धि सामग्रियों के आयोजन में करे ॥१७॥
६॥२३॥ यह तेईसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥
“उच्छ्रयस्व०” इत्यादि से बीज को अभिमन्त्रण करके बीज को बोने
के लिये खेत में ले जावे ॥१॥ और उसमें से तीन मुठ्ठी लेकर खेत में
धर कर उसे मट्टी से ढक देवे । और तब तय्यार खेत में प्रति ऋचा से
बीज बोवे ॥२॥ उच्च स्थान में जाकर अभ्यातानान्त करके “अभित्यं०”
इत्यादि ४ ऋचा वाले सूक्त से जलपात्र धर करके उस जलपात्र में सोम
रस मिला कर सारूपवत्स गौ के दूध में ओदन पकाकर अभिमंत्रण
करके भोजन करे । तब उत्तर तंत्र करे । यह कर्म मण्डप के पूर्व तथा
पश्चिम द्वार पर करे । मण्डप के पश्चिम अग्नि से जलावे ॥३॥४॥५॥६॥
काले मृग के चर्म पर सोमांशू को बखेर देवे और सोम रस मिले को
खावे ॥५॥ यदि वह सोमरस मिला-सम्पात वाला-काल पाकर स्वयं
जल उठे तो जानो कि मनोरथ सफल हुआ ॥६॥ “तां सवित०”
इत्यादि से गो दामन बान्धे ॥७॥ “संमासिञ्चन्तु०” से सर्वोदक में मैश्र
धान्य को स्थालीपाक पका कर खावे ॥८॥ “दिव्यं सुपर्णं” इत्यादि से