कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
Page 20 of 361
Read in context( ६ )
शापकृत मानसिकखेद, छूत रोग, वात रोग को दूर करता है और विष
तुल्य मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करता है। भूतोन्माद का नाशक
है। घृताची-देखो बड़ी इलायची चीपद्रु (चीड़वृक्ष) विविध फुन्सी, फोड़ों
विद्रधि को नष्ट करता है। जङ्गिडमणि—मोह आदि मानसिक रोगों को
दूर करती है। और अनेक प्रकार के असाध्य रोग कृत्या द्वारा किये रोगों
को नाश करता है। जीवन्ती—जीवन देने, रोग दूर करने, स्वास्थ्य
रक्षक, बल पुष्टि देनेवाली रसायन है। जीवला—(सिंह पिप्पली) पशुओं
के रोगों को दूर करती है। तरुणक—(तृण रोहिष तृण) सर्प के काटे
विष को नष्ट करती है। तस्तुव—(कड़वी तोरी) सर्प विष को नष्ट
को नष्ट करती है। तिल पिञ्जी (तिलों की मञ्जरी एवं नाल) क्षेत्रिय
रोगों को नष्ट करती है और तिल नाल के भस्म खेतों के अनुपज दोष
को दूर करती है। तौदी—(बड़ी इलायची) देखो पूर्व कहा। दर्भ
(दाभ) सर्प के काटे विष का बन्धक है। दर्भमणि—स्वास्थ्य एवं
दीर्घायु देने वाला रसायन है। दश वृक्ष (दशमूल) सन्धिवात मस्ति-
ष्कवात (मृगी,) रोगों का नाशक है। दासी-(काकजङ्घा) ज्वर को नष्ट
करता है। दृत्ति (जोक प्राणी) सर्प काटे विष को चूसने वाली है।
देवी (सौराष्ट्र की मट्टि) केशों को लम्बे, काले, दृढ़ बना देती है।
नघमार—(कुष्ठभेद मीठा कुष्ठ) शिरो रोग, तृतीयक, सन्तत, ऋतु ज्वर
को नष्ट करता है। नघारिष—(कुष्ठभेद कड़वाकूट) उपरोक्त गुण वाला
है। नमः—(वज्र अभ्रक) दर्भमणि के गुण जानो। नलदी (जटा-
मांसी) विषतुल्य मादक प्रभाव वाले कृमियों को नष्ट करती है।
नवती (पिपीलिकायें) सर्प काटे विष को नष्ट करती है। परुषवार—
(मूंज) सर्प काटे विप का बन्धक है। पर्जन्य (दारु हल्दी) स्वास्थ्य
और आयु को प्रदान करती है, रसायन है।
पर्णमणि = इसमें सोमलता के सब गुण हैं। पाढा (पाठा, पाढ़)
शस्त्र प्रहार के घाव को अत्यन्त लाभ दायक है। पिङ्ग (हरिताल) प्रसूति
रोग, गर्भ भक्षक कृमियों, मृतवत्सा रोग जन्म कर सन्तान मरजाने
के रोग को नष्ट करती है। पिप्पली (पीपल दवा) आक्षेपक, पक्षाघात,
गठिया, आदि वातरोग को नष्ट करती है। जीवन देनेवाली रसायन है।
पीला (पिप्पली) विषतुल्य मादक प्रभावकारी, कृमियों को नष्ट करती
है। भूतोन्माद नाशक है। पृश्निपर्णी (पृष्टिपर्णी) बवासीर, दाद, कुष्ठ-
रोग, योनिविकार, गर्भक्षय, आदि कृमियों से आक्रान्त रोगों को नष्ट