कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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दोष, निद्राक्षय को दूर करता है । एवं विषतुल्य मादक प्रभाववाले
कृमियों को नष्ट करता है । हलीमक-पाण्डु, विषभोगजन्यक्षय, अङ्गफूटन
विसर्प, श्वास, हृदयरोग, नेत्ररोग को नष्ट करता है एवं आयु बढ़ाने
वाला रसायन है। पशुओं को स्वास्थ्य, पुष्टि और सन्तति शक्ति देने
वाला है । आसुरी—सफेद सरसों-श्वेतकुष्ठ, गलितकुष्ठ को नष्ट करती
है । स्त्रियों में सुभागत्व और सौन्दर्य कान्ति बढ़ाती है । इन्द्र (इन्द्रायण
लाल फल उछलनेवाले, फूकारनेवाले, लिपटनेवाले और तिरछी रेखावाले
सर्पों के विष को दूर करता है और सब ही सर्पों के विष को नष्ट करता
है । उपजीका—'उपजीकानुषिक्त (दीमकों का मुखस्राव) नशा करने
वाले स्थावर विष को नष्ट करता है । उपजीका-उपजीकोद्भूत उखाड़ी-
उगली वल्मीकमृत्तिका, व्रणस्राव को नष्ट करती है। ऋषभ (अष्टवर्ग की
ऋषभक दवा) वन्ध्यापन और गर्भपात रोगको नष्ट करती है और
गर्भ स्थापन शक्ति देती है । औक्षगन्धि—(वृष्यगन्धाबला) विष तुल्य
मादक प्रभाव करने वाले कृमियों को, भूतोन्माद को दूर करती है।
औदुम्बरमणि (गूलर वृक्ष) पुष्टि, बल और सन्तति उत्पन्न करने की
शक्ति देता है । और पशुओं को स्वास्थ्य एवं सन्तान शक्ति देता है । कन-
कक (टङ्कण सुहागा) सर्प विष नाशक है । खाने से सर्प विष को
बाहर ले आता है । कन्या (बड़ी इलायची) इसकी जड़ से सर्प विष
नष्ट होता है। करम्भ (फूल प्रियङ्गु, मालकौनी) खान पान में दिये
स्थावर विष के प्रभाव को नष्ट करती है । कल्याणी (माषपर्णी) काम-
शक्तिवर्द्धक वाजीकरण है । कश्यपवीवर्ह (चमरी मृगपुच्छ) इसका
झाल सारे रोगों में हितकर है । कान्दा विष (कन्द विष) सर्प विषना-
शक, अर्थात् सर्प विष को बाहर ले आता है । कुमारिका (बांझक कोड़ा)
सर्प विष नाशक है (इसके फल नहीं आते, जङ्गलों में होती है) कुषुम्भक
(नेवलाप्राणी) सर्प के विष को चूसने वाला है। इसके मल मूत्र, लार,
रोम, अङ्ग, सर्प विष को निर्बल कर बाहर निकाल देते हैं । कुष्ठ (पर्वत
पर का कुष्ठ) शिरोरोग, नेत्रान्ध, रक्तदोष को दूर करता है । नपुंस-
कता नाशक वृष्य है । एवं तृतीयक, चातुर्थिक, सन्तत और ऋतु के ज्वर
को एवं मलेरिया ज्वर को नष्ट करता है। कृष्णा—(नीलिनी, नील)
पहिले ही इसके गुण कहे गये । केशवर्धिनी (भृङ्गराज, भांगरा) कान्ति
देने, तेज बढ़ाने, धातु वृद्धि, और केशों को बढ़ाने वाली है । गन्धारि
(कचूर) ज्वर नाशक है । गुग्गुल (गूगल) शरीर के कठिन रोगों,