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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

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करती है। विशेषतः योनिदूषक और गर्भघातक कृमियों को नष्ट करती
है। पैद्व (सफेद आक या अर्क) सर्प के काटे घाव पर लेप
करने से विष को अत्यन्त निर्बल करती है, वमन विरेचन द्वारा विष
प्रभाव को बहुत ही नष्ट करती है। प्रक्री-(सोमलता) नशा करने वाले
स्थावर विष की मूर्च्छा और उसके प्रभाव को अत्यन्त नष्ट करती है।
प्रमन्दनी (प्रमदिनी घातकी) विषतुल्य, मादक प्रभावकारी कृमियों
को नष्ट करती है, भूतोन्माद नाशक है। ब्रह्म (ब्रह्म-वृक्ष उदुम्बर गूलर)
'योनिदोष, गर्भस्राव, जात घातक रोग और योनि एवं गर्भाशय में
होने वाले कृमियों को नष्ट करती है। भद्रा—(कृष्ण सारिवा) रुधिर
बहने, चोट से पिस जाने, दण्डेजाने, कट आने, जल जाने और हड्डी
टूट जाने में हितकर हैं। भरी मूल दर्भ (उशीर-खस) क्रोध, मन के
उद्वेग रूप भ्रम और उन्माद को शान्त करती है। मगध (पिप्पली) गुण
पहिले कहे गये हैं। मधु (शहद) सर्प काटे विषका नाशक है। मधु-
जाता (शहद की खाँड) टेढ़े चलने वाले सर्प आदि और मच्छर जैसे
विष कृमियों के विष को दूर करती है)—आगे लिखी दवाओं में ये ही
गुण हैं। मधुला (कपिलद्राक्षा), मधुश्रुत (महुआ) मधू (मुलहठी)
मयूरी (मोरनी, उसके बच्चे) सर्पविषको चूसने नष्ट करनेवाले हैं।
मित्र (अतीस) सर्पविष नाशक है। मुनि देवमूल (अगस्त्य वृक्षकी
जड़) अपची-गण्डमालाओं को नष्ट करती है। यव पलाली (जौ की
मञ्जरी, जौ की नाल) क्षेत्रिय रोग को हटाती है और नाल की भस्म
खेत के अनुपज दोष को दूर करती है। रामा (नीलिनी, नील) गुण
पहिले कहे गये। रोपणका (दूब) हलीमक, कामला, पाण्डु को नष्ट
करती है। रोहिणी, (मांस रोहिणी) रुधिर स्राव, चोटसे पिसजाने,
दरेडेजाने, जलजाने, कट जाने, हड्डी टूटजाने में हितकर है। लवण
(नमक) ग्रीवा, कक्षा, वंक्षणमें होनेवाली विवर्ण हुई कठोर, बहने वाली
अपची गण्डमालाओं का नाशक है। लाक्षा (लाख) टूटे को जोड़ने,
पुराने घावों को भरने, नयों को शीघ्र ही ठीक करने, चोटको अच्छा
करने वाली है। वचस्-(बचा, बच्छ) गुण पहिले कहे गये। दर्भ
मणि के समान गुण। वरणमणि (वरना) वरणावती और वरण नामों
में देखो। वरणावती (वरणों की पञ्चाङ्ग खान पान में स्थावर बिष को
नष्ट करती है। वरुण (वरदाय वृक्ष) सर्प विषनाशक, शिरोरोग नाशक
है। वाक (बक पञ्चाङ्ग अगस्त्य वृक्ष का पञ्चाङ्ग) मन्या. ग्रीवा, स्कन्ध