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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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शशम लम्बक ८२७
उस क्रूर और पराक्रमी भील ने उसे गुफा के बाहर निकालकर, प्रातः काल देवी की
बलि देने के लिए, एक पेड़ में कसकर बाँध दिया ॥१५८॥
और, भोजन करके रात में उसके देखते-ही-देखते उसकी स्त्री के साथ व्यभिचार किया।
तदुपराम्त उसे साथ लेकर आनन्द से सो गया ॥१५९॥
पेड़ से बँधे हुए उस ईर्ष्यालु पुरुष ने उस भील को सोये हुए देखकर चंडी की स्तुति करके
अत्यन्त दीन भाव से शरण की प्रार्थना की ॥१६ ॥
चंडी ने प्रकट होकर उसे वरदान दिया जिससे वह बन्धना से मुक्त हो गया। तदनन्तर, उसी
की तलवार से ईर्ष्यालु ने भील का सिर काट दिया और अपनी स्त्री को जगाकर चलने के लिए
कहने लगा। वह भी उठी और दुःख से उसके साथ जाने को तैयार हुई ॥१६१-१६२॥
वह दुष्टा उस भील के कटे सिर को चुपके-से अपने संग रखकर पति के साथ चल पड़ी।
रात के अँधेरे में वह ईर्ष्यालु अपनी दुष्ट स्त्री की यह चाल लख नहीं सका ॥१६३॥
प्रातःकाल किसी नगर में पहुँचकर वहाँ वह भील का सिर दिखाकर और पति को
हत्यारा बताकर रोने-चिल्लाने लगी ॥१६४॥
तब नगर के रक्षक (सिपाही) उस स्त्री को उसके पति के साथ राजा के सामने ले गये।
वहाँ पूछे जाने पर उसने सच्चा समाचार राजा को सुना दिया ॥१६५॥
तदनन्तर, उस देश के राजा ने यथार्थ बात का पता लगाकर उस दुष्ट स्त्री के नाक-कान
कटवा दिये और उसके पति को छोड़ दिया ॥१६६॥
वह उसका पति भी उस दुष्ट स्त्री के स्नेह-रूपी ग्रह से छूटकर किसी प्रकार अपने घर आया।
'महाराज ! ईर्ष्या से पागल स्त्री इस प्रकार के कांड कर डालती है ॥१६७॥
पुरुष की यह ईर्ष्या ही स्त्री को पर पुरुष का संग कराना सिखाती है। इसलिए, ईर्ष्या को
छिपाकर ही बुद्धिमान् पुरुष को नारी की रक्षा करनी चाहिए ॥१६८॥
और अपना भला चाहनेवाले पुरुष को अपनी गुप्त बात कदापि स्त्री से प्रकट नहीं करनी
चाहिए। इस विषय पर एक कथा सुनो ॥१६९॥
नाग और गरुड की कथा
यह पर एक नाग मनुष्य का रूप धारण करके गरुड के भय से भागकर भूमि पर आकर
किसी वेश्या के घर में रहता था ॥१७०॥
वेश्या ने उससे प्रतिदिन का मूल्य पाँच सौ हाथी माँगा। वह नाग भी अपने प्रभाव से
उसे प्रति दिन पाँच सौ हाथी देता था ॥१७१॥
एकबार उस वेश्या ने नाग से बड़े ही आग्रह के साथ पूछा कि 'तुम्हें प्रति दिन इतने हाथी
कहाँ से मिलते हैं सच बताओ और यह भी कहा कि तुम कौन हो ? ॥१७२॥