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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 782

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ उल्टी (180 अंश घूमी हुई) दिशा में है तथा इसका अधिकांश भाग अत्यधिक धुंधला एवं क्षत-विक्षत है। सीधे विन्यास में पठनीय अंश का देवनागरी लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:


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जब वह वंशी रव सुने तब अति व्याकुल होकर भागे उस दशा में उसके
सब अंग शिथिल होगये हैं इस से वह गिर-गिर पडती है और फिर उठ कर वेग से दौडती
लज्जा से संकोच बन जाती है और भय भी उस को रोक रहा है तब तेरी दशा पूरी
सकेगी अथवा नहीं ॥ १- ॥