कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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राजा चन्द्रप्रभ पत्र सुनकर प्रसन्न हुए और उन्होंने दूत का सत्कार किया।
प्रहस्त द्वारा कोंकणाधीश की कन्या चन्द्रावती को उसके पिता के यहाँ शीघ्र ही पहुँचावा
दिया।।१६१ १६२।।
प्रातःकाल ही वे सब राजा सूर्यप्रभ को आगे करके जनमेजय के साथ विमान द्वारा
अपरान्त (कोंकण) देश को गये ।।१६३।।
कन्या के मिल जाने से आनन्दित राजा सुभट ने अपने देश में आए हुए उन बराती
राजाओं तथा समधियों का खूब सम्मान और सत्कार किया तथा कन्या के विवाह का समारोह
भी कर डाला ।।१६४।।
राजा सुभट ने कन्यादान में चन्द्रिकावती को इतना धन रत्न आदिक दिया जिससे
अन्य सभी समधी राजा लज्जित हो गये ।।१६५।।
जब कि सूर्यप्रभ श्वशुर सुभट के घर पर ही था तभी लाबाणक नगर से राजा पौरव
का दूत वहाँ आया ।।१६६।।
उसने भी राजा चन्द्रप्रभ से अपनी स्वामी का सन्देश कहा कि 'तुम्हारे पुत्र सूर्यप्रभ ने मेरी
कन्या सुलोचना का अपहरण किया है मुझे इसका सन्ताप नहीं है। किन्तु, तुम उसे मेरे घर
पर ले आओ, तो हम विवाह-संस्कार सम्पन्न करें' ।।१६७-१६८।।
ऐसा सुनते ही राजा चन्द्रप्रभ ने प्रसन्नता से दूत का सत्कार किया और प्रहस्त द्वारा
विमान में सुलोचना को उसके पिता के यहाँ पहुँचावा दिया ।।१६९।।
तब वे सभी राजा सुभट के साथ सूर्यप्रभ को लेकर ध्यान करते ही उपस्थित होनेवाले
विमान से लाबाणक नगर गये ।।१७० ।।
वहाँ पौरव ने सूर्यप्रभ और सुलोचना का विवाह करके सभी राजाओं का समुचित
सत्कार किया ।।१७१।।
सभी बराती राजाओं की जब भली भाँति सेवा-शुश्रूषा की जा रही थी तभी चीन के
राजा सुरोह ने भी राजा चन्द्रप्रभ के समीप दूत भेजा ।।१७२।।
चीन के राजा ने भी दूत द्वारा वही प्रार्थना की कि 'कन्या और उसे अपहरण करनेवाले
सूर्यप्रभ के साथ हमारे घर पधारिए' ।।१७३।।
तब प्रसन्नचित्त राजा चन्द्रप्रभ ने चीन-नरेश की कन्या विद्युन्माला को प्रहस्त के साथ
उसके पिता के यहाँ पहुँचावा दिया ।।१७४।।