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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १७९
तब उसपर छोटे भाई अनिच्छासेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को
कहने के लिए पिता घर के भेज दिया ॥१४६॥
वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वारा आकाश मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप
जा पहुँचा ॥१४७॥
वहाँ जाकर उसने अत्यन्त उस कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न
किया जैसे चन्द्रमा चकवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥१४८॥
आते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने
अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनाकर उनकी शंका दूर कर दी ॥१४९॥
और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में गुण की प्राप्ति तक का
सारा समाचार सुना दिया ॥१५०॥
और, यहाँ पर दुष्ट विमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा भी उसने
सुनी जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ॥१५१॥
तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और अमला से प्रशंसित
अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥
कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित
अनिच्छासेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ॥१५३॥
और, कहा—'आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ
लाता हूँ। अतः पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की आज्ञा दें ॥१५४॥
यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर
अनिच्छासेन उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही मीनपुर नगर जा राजा की आज्ञा पाकर ही अपने
भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥
उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके
समीप ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा—दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥
उसके पूछने पर कि यह क्या हुआ? नीचे मुँह किये हुई और लज्जाभिनय सी करती
हुई यमदंष्ट्रा बोली—॥१५८॥
'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस
मदनदंष्ट्रा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ
देखा और वचनों से फटकारा ॥१५९-१६०॥