कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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पञ्चम तरङ्ग
कलिङ्गसेना और सोमप्रभा की कथा (चालू)
तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल आई हुई सहेली सोमप्रभा से विश्वस्त बातें करती हुई
कलिङ्गसेना कहने लगी ॥१॥
मेरा पिता मुझे प्रसेनजित् को अवश्य दे देगा यह निश्चित है। यह मैंने अपनी माता से
सुना है और तूने उस वृद्ध प्रसेनजित् को देखा है ॥२॥
वत्सराज को तो रूप (सुन्दरता) में जैसा तूने वर्णित किया है कि उसने कानों के
मार्ग से प्रवेश करके मेरा हरण कर लिया है ॥३॥
इसलिए पहले मुझे प्रसेनजित् को दिखाओ। और, मुझे वहाँ भी ले चलो जहाँ
वत्सराज है। पिता से क्या प्रयोजन और माता से भी क्या करना है ॥४॥
इस प्रकार कहती हुई उत्कंठित कलिङ्गसेना को सोमप्रभा ने कहा—'यदि चलना है तो
यन्त्रचालित आकाशयान से चलें ॥५॥
किन्तु तुम अपने वस्त्र आभूषण और सबलों को साथ ले लो क्योंकि वत्सराज को
देखकर फिर तुम लौट न सकोगी ॥६॥
फिर तुम माता-पिता को न देखोगी और न उन्हें स्मरण ही करोगी अर्थात् सब भूल
जाओगी ॥७॥
और हे सखि न मैं ही तुम्हारे पति के घर आऊँगी'। यह सुनकर आँसू बहाती हुई राज-
कुमारी सखी से बोली ॥८॥
'मेरी प्यारी सखी यदि ऐसा है, तो तुम वत्सराज को ही यहाँ ले आओ। मैं तेरे बिना
यहाँ एक क्षण भी न ठहर सकूँगी ॥९॥
क्या चित्रलेखा ने उपाय करके अनिरुद्ध को उषा के पास नहीं ला दिया था ? इस कथा
को जानती हुई भी तुम मुझसे सुनो ॥१०॥
उषा और अनिरुद्ध की कथा
उषा के नाम से प्रसिद्ध बाणासुर की कन्या थी। उसने गौरी की आराधना की और
गौरी ने उसे पति-प्राप्ति का वरदान दिया ॥११॥
'कि स्वप्न में तुम जिसका संग प्राप्त करोगी वही तुम्हारा पति होगा' ॥१२॥
तब उसने एकबार देवकुमार के समान किसी को स्वप्न में देखा। गान्धर्व विधि से उसके
साथ विवाह आदि किया और प्रातःकाल उठी ॥१३॥
उठने पर स्वप्न में देखे हुए उस पति को न देखकर और सम्भोग के लक्षणों को देखकर
गौरी के वर को स्मरण करके वह आतंक और भय से व्याकुल हो गई ॥१४॥
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