कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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प्रातःकाल राजा ने कन्या के शयनागार के द्वार पर पड़े हुए और कटकर गिरे हुए हाथ
को देखा ॥२८५॥
राजा ने समझा कि विदूषक ने भय से लेकर यहाँ दूसरों का प्रवेश न हो, ऐसा सोचकर
द्वार पर परिघ (अर्गल) के समान भुजा की अर्गला लगा दी है ॥२८६॥
तब अत्यन्त प्रसन्न राजा ने दिव्य प्रभावशाली विदूषक को धन के साथ कन्या प्रदान की।
वह विदूषक भी मूर्तिमती सम्पत्ति के समान उस सुन्दरी राजकन्या के साथ कुछ दिनों तक
रहा ॥२८७-२८८॥
एक बार मङ्गा से मिलने की शीघ्रता के कारण विदूषक रात में उठकर चल पड़ा ॥२८९॥
दूसरे दिन प्रातःकाल राजकुमारी उसे न देखकर अत्यन्त दुःखी हुई, किन्तु राजा ने उसके
पुनः लौटने की आशा दिखाकर उसे धीरज बँधाया ॥२९०॥
वह विदूषक भी दिनरात चलते-चलते पूर्व समुद्र के समीप ताम्रलिप्ति नामक नगरी
में पहुँचा ॥२९१॥
उसने वहाँ पर समुद्र-पार जाने की इच्छा रखनेवाले स्कन्ददास नामक व्यापारी वैश्य
से मित्रता की ॥२९२॥
और अत्यधिक धन से भरे हुए उसके जहाज पर चढ़कर विदूषक ने समुद्र-मार्ग से यात्रा
की ॥२९३॥
क्रमशः जहाज समुद्र के बीच पहुँच गया और किसी वस्तु से फँसकर वहीं अड़
गया ॥२९४॥
नाना से समुद्र की पूजा करने पर भी जब जहाज हिला नहीं, तब अत्यन्त दीनता से
बनिये ने कहा कि 'मेरे इस फँसे हुए जहाज का जो छुड़ा देगा, उसे मैं अपनी संपत्ति का आधा
हिस्सा और अपनी कन्या दे दूंगा' ॥२९५॥
यह सुनकर धैर्यशाली विदूषक ने कहा कि 'मैं पानी में उतरकर ज्ञात करता हूँ और
तुरन्त इस फँसे जहाज को छुड़ाता हूँ' ॥२९६॥
'तुम लोग मुझे सन और रस्सियों से कसकर बाँधो और ऊपर से पकड़े रहो ॥२९७॥
जब जहाज छूटकर चलने लगे तब तुमलोग उन रस्सियों द्वारा मुझे ऊपर खींच
लेना' ॥२९८॥