कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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श्रीदत्त और मृगांकवती की कथा
मालव देश में यज्ञसेन नाम का एक ब्राह्मण था। उस सज्जन ब्राह्मण के दो लोकप्रिय
पुत्र थे ॥६॥
उनमें एक कालनेमि के नाम से और दूसरा विगतभय नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥७॥
पिता की मृत्यु के पश्चात् वे दोनों भाई बाल्यावस्था के अनन्तर विद्या प्राप्ति के लिए
पाटलिपुत्र नगर को गये ॥८॥
वहाँ पर विद्या-प्राप्ति के अनन्तर उनके अध्यापक देवशर्मा ने मूर्त्तिमती विद्याओं के समान
अपनी दो कन्याएं उन्हें दान दे दी ॥९॥
विवाह के अनन्तर कालनेमि ने अन्यान्य पड़ोसी गृहस्थों को अपने से अधिक धनवान्
और सुखी देखकर ईर्ष्या के कारण होम के द्वारा नियमपूर्वक लक्ष्मी की आराधना प्रारम्भ की ॥१०॥
उसकी आराधना से प्रसन्न लक्ष्मी ने स्वयं प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा कि
तुम पर्याप्त धन और पृथ्वीपति पुत्र प्राप्त करोगे ॥११॥
किन्तु इतना सब होते हुए भी अन्त में तुम्हारा वध चोरों के समान होगा क्योंकि तुमने
अग्नि में जो हवन किया है वह ईर्ष्या से कलुषितचित्त होकर किया है ॥१२॥
ऐसा कहकर लक्ष्मी अन्तर्धान हो गई और कालनेमि भी धीरे-धीरे महाधनी हो गया।
कुछ दिनों बाद उसके एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ ॥१३॥
श्री (लक्ष्मी) के वरदान से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है, इसलिए उसका नाम श्रीदत्त रखा
और पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ॥१४॥
श्रीदत्त ब्राह्मण होने पर भी क्रमशः बड़ा होने पर, अस्त्र-शस्त्र-विद्याओं में एवं मल्लयुद्ध
में अद्वितीय हो गया ॥१५॥
कालनेमि का दूसरा भाई विगतभय पत्नी को सर्प के काट लेने के कारण उसकी सद्गति
के निमित्त तीर्थयात्रा के लिए दूसरे देश को चला गया ॥१६॥
श्रीदत्त को धीर और वीर जानकर गुणग्राही राजा वल्लभशक्ति ने अपने पुत्र विक्रमशक्ति
का मित्र बना दिया ॥१७॥
अत्यन्त अभिमानी राजपुत्र विक्रमशक्ति के साथ श्रीदत्त की मित्रता इस प्रकार हुई
जैसे दुर्योधन के साथ भीमसेन की थी ॥१८॥
तदनन्तर अवन्ति-देश में उत्पन्न हुए बाहुशाली और वज्रमुष्टि नामक दो क्षत्रिय श्रीदत्त के
मित्र बन गये ॥१९॥
मल्लयुद्ध में जीते हुए अन्यान्य गुणग्राही दक्षिण देशवासी तथा मंत्रियों के पुत्र श्रीदत्त के
स्वयं मित्र बन गये ॥२०॥