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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१

Page 143Permalink

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१


मुखमिति यद्वत् । तमेतम् ईश्वरमात्मानं ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्यागमोपदेशमनु साक्षादनुभवन्ति धीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वरभूतानां शाश्वतं नित्यं सुखम् आत्मानन्दलक्षणं भवति; नेतरेषां बाह्यासक्तबुद्धीनामविवेकिनां स्वात्मभूतमप्यविद्याव्यवधानात् ॥ १२॥जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुखका आधार दर्पण नहीं है । जिनकी बाह्य वृत्तियाँ निवृत्त हो गयी हैं ऐसे जो धीर—विवेकी पुरुष उस ईश्वर—आत्माको देखते हैं—आचार्य और शास्त्रका उपदेश पानेके अनन्तर उसका साक्षात् अनुभव करते हैं उन परमात्मस्वरूपताको प्राप्त हुए पुरुषोंको ही आत्मानन्दरूप शाश्वत—नित्यसुख प्राप्त होता है। किन्तु दूसरे जो बाह्य पदार्थोंमें आसक्तचित्त अविवेकी पुरुष हैं उन्हें यह सुख स्वात्मभूत होनेपर भी अविद्यारूप व्यवधानके कारण प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १२॥
किं चइसके सिवा

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना-

मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-

स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३॥

जो अनित्य पदार्थोंमें नित्यस्वरूप तथा ब्रह्मा आदि चेतनोंमें चेतन है और जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकी पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्य-शान्ति प्राप्त होती है, औरोंको नहीं ॥ १३ ॥