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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

Page 27Permalink

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५


संप्रसादनार्थमनशनेनोपोषिताम् एकैकां रात्रिं प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ॥ ९ ॥अपनी अधिक प्रसन्नताके लिये तुम बिना भोजन किये बितायी हुई एक-एक रात्रिके प्रति मुझसे तीन वर—अपने अभीष्ट पदार्थविशेष माँग लो ॥ ९ ॥
नचिकेतास्त्वाह—यदि दित्सुर्व्वरान्—नचिकेताने कहा—यदि आप वर देना चाहते हैं तो—

प्रथम वर—पितृपरितोष

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या-
द्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत
एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥

हे मृत्यो ! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ तथा आपके भेजनेपर मुझे पहचानकर बातचीत करें—यह मैं [आपके दिये हुए] तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ ॥ १० ॥

शान्तसंकल्प उपशान्तः संकल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्नमनाश्च यथा स्याद्वीतमन्युर्विगतरrenderरोषश्च गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्रसृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेषितं गृहं प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्ध-जिस प्रकार मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प—जिनका ऐसा सङ्कल्प शान्त हो गया है कि 'न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा,' सुमनाः—प्रसन्नचित्त और वीतमन्यु—क्रोधरहित हो जायँ और हे मृत्यो ! आपके भेजे हुए—घरकी ओर जानेके लिये छोड़े हुए मुझसे विश्वस्त—लब्धस्मृति होकर अर्थात्