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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

१३२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

Page 144Permalink
१३२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| नित्योऽविनाश्यनित्यानां विनाशिनाम् । चेतनश्चेतनानां चेतयितॄणां ब्रह्मादीनां प्राणिनाम् अग्निनिमित्तमिव दाहकत्वम् अनग्नीनामुदकादीनामात्मचैतन्यनिमित्तमेव चेतयितृत्वमन्येषाम् । किं च स सर्वज्ञः सर्वेश्वरः कामिनां संसारिणां कर्मानुरूपं कामान्कर्मफलानि स्वानुग्रहनिमित्तांश्च कामान्य एको बहूनाम् अनेकेषामनायासेन विदधाति प्रयच्छतीत्येतत् । तमात्मस्थं ये अनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः उपरतिः शाश्वती नित्या स्वात्मभूतैव स्यान्नेतरेषामनेवंविधानाम् ॥ १३ ॥ | जो अनित्यों--नाशवानोंमें नित्य—अविनाशी है, चेतन अर्थात् ब्रह्मा आदि अन्य चेतयिता प्राणियोंका भी चेतन है। जिस प्रकार जल आदि दाहशक्तिशून्य पदार्थोंका दाहकत्व अग्निके निमित्तसे होता है वैसे ही अन्य प्राणियोंका चेतनत्व आत्मचैतन्यके निमित्तसे ही है। इसके सिवा वह सर्वज्ञ तथा सर्वेश्वर भी है, क्योंकि वह अकेला ही बिना किसी प्रयासके अनेक सकाम और संसारी पुरुषोंके कर्मानुरूप भोग यानी कर्मफल तथा अपने अनुग्रहरूप निमित्तसे हुए भोग विधान करता अर्थात् देता है। जो धीर (बुद्धिमान्) पुरुष अपने आत्मामें स्थित उस आत्मदेवको देखते हैं उन्हींको शाश्वती—नित्य यानी स्वात्मभूता शान्ति—उपरति प्राप्त होती है—अन्य जो ऐसे नहीं हैं उन्हें नहीं होती ॥ १३ ॥ |


तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।

कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४ ॥

उसी इस [ आत्मविज्ञान ] को ही विवेकी पुरुष अनिर्वाच्य परम सुख मानते हैं । उसे मैं कैसे जान सकूँगा ? क्या वह प्रकाशित ( हमारी बुद्धिका विषय ) होता है, अथवा नहीं ? ॥ १४ ॥