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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

Page 73Permalink

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥

यह विपश्चित्—मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारणसे ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ [अर्थान्तररूपसे] बना है। यह अजन्मा, नित्य (सदासे वर्तमान) शाश्वत (सर्वदा रहनेवाला) और पुरातन है तथा शरीरके मारे जानेपर भी स्वयं नहीं मरता ॥ १८ ॥

न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्य अनेकविक्रियाः तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थं न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेधावी, अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् ।यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और न मरता ही है। उत्पन्न होनेवाली अनित्य वस्तुके अनेक विकार होते हैं। यहाँ—आत्मामें सब विकारोंका प्रतिषेध करनेके लिये 'न जायते म्रियते वा' ऐसा कहकर सबसे पहले उनमेंसे जन्म और विनाशरूप आदि और अन्तके विकारोंका निषेध किया जाता है। कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्वभावके कारण आत्मा विपश्चित् यानी मेधावी है।
किं च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद्बभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माऽजो नित्यः शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयंतथा यह आत्मा कहींसे अर्थात् किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं हुआ और न अर्थान्तररूपसे स्वयं अपनेसे ही हुआ है। इसलिये यह आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत—यानी क्षयरहित है, क्योंकि जो अशाश्वत होता है वही क्षीण हुआ