कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ६८
ऐसा है, जिसमें कुछ न कुछ शुभ का अंश मिश्रित न हो। जब यह दशा है तो कहिए कोई क्या करे ? संसार में ऐसे मनुष्य वा समुदाय भी हुए हैं, जिन्होंने दूसरों की हिंसा से बचने के लिए अपनी हिंसा करना उचित समझा क्योंकि उनकी समझ में जीवित रहने से किसी न किसी प्राणी के कष्ट में पड़ने या किसी के प्राणघात होने का भय रहता है। उनकी दृष्टि में मर जाना ही पापों से बचना है। जैनियों का इस सिद्धान्त पर अधिक विश्वास है। देखने में तो यह सिद्धान्त अच्छा मालूम होता है परन्तु इसकी मीमांसा केवल भगवद्गीता करती है। गीता कहती है "कर्म किये जाओ, पर बेलाग बने रहो।" जो कर्म बुरे या भले हम अपने लिए करते हैं उनका फल बुरा या भला हमको ही मिलता है। किन्तु जो कर्म हम अपने लिए नहीं करते उनका फल भी हमारे लिए नहीं होता। यदि कोई मनुष्य यह जानता हुआ कि "मैं अपने लिए काम नहीं कर रहा हूँ" हज़ारों मनुष्यों को मार डाले या आप ही मर जावे तो वह न तो मारनेवाला है और न मरनेवाला। इसलिए कर्मयोग की यह शिक्षा है कि "संसार को न छोड़ो, उसमें रह कर सदा कर्म करते रहो, पर यह बात स्मरण रक्खो कि तुम संसार नहीं हो और न यह संसार तुम्हारे लिए है। किन्तु संसार मैं तुम हो और संसार के लिए तुम हो। अपने आप को बिलकुल मिटा दो, सारे विश्व को अपना ही रूप समझो।" मूर्ख माता-पिता अपने पुत्रों को यह प्रार्थना सिखाते हैं—"हे ईश्वर ! तूने मेरे लिए चन्द्र, सूर्य बनाये।" मानो ईश्वर के लिए सिवा इन बच्चों के खिलौने बनाने के और काम ही न था। ऐसी तुच्छ बातें अपनी सन्तान को कभी