कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
को न झुका दिया हो। बुद्ध ने त्याग और सदाचार के सिवा ईश्वर के सम्बन्ध में कोई भी शिक्षा नहीं दी, परन्तु फिर भी संसार में उसका कितना मान है। कट्टर मनुष्य इस बात को नहीं देखता कि जिसके साथ उसका मतभेद है, उसका भी उद्देश या अन्तिम लक्ष्य वही है, जो कि इसका अपना है। ईश्वर पर सच्चा विश्वास रखनेवाला और धर्म का आचरण करनेवाला--ये दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं। ईश्वर-भक्त जो कुछ करता है, वह सब ईश्वर के अर्पण कर देता है। धर्मात्मा भी अपने लिए कुछ नहीं करता, किन्तु दूसरों के लिए करता है। जिस प्रकार ज्ञानी ज्ञान से ममता को दूर कर देता है, इसी प्रकार त्यागी भी त्याग से ममता को अपने पास नहीं आने देता। यही वह उच्च पद है कि जहाँ आकर कर्म, भक्ति और ज्ञान ये तीनों एक हो जाते हैं। प्राचीन समय के आध्यात्मिक उपदेष्टा कहा करते थे कि संसार ईश्वर नहीं है अर्थात् ईश्वर और वस्तु है और संसार और वस्तु है और यह भेद अनुचित नहीं है। संसार से तात्पर्य स्वार्थ है और ईश्वर में स्वार्थ या काम का लेश नहीं। जो संसार में लिप्त होते हैं, वे ही स्वार्थी हैं; जो ईश्वर-परायण होते हैं, वे संसार में रहते हुए भी निष्काम हो सकते हैं। सम्भव है कोई मनुष्य राजसिंहासन पर बैठा हुआ और स्वर्ण-जटित मन्दिरों में रहता हुआ भी निःस्वार्थ जीवन व्यतीत करे, उसका मन ईश्वर में लगा है। दूसरा मनुष्य झोपड़े में रहता हुआ और चिथड़े पहनता हुआ कामुक बना रहे तो यही संसारी है।
अब हम फिर अपने प्रकृत विषय पर आते हैं। कोई शुभ कर्म ऐसा नहीं है, जिसमें अशुभ का अंश न हो और न कोई अशुभ कर्म