कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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न सिखाओ। और भी मनुष्य हैं जो दूसरे प्रकार की मूर्खता करते हैं। वे कहते हैं कि ये सब जीव-जन्तु हमारे लिए बनाये गये हैं, इनको मारो और खाओ। यह संसार केवल मनुष्य का भोगायतन है। ये सब स्वार्थी और लोलुप मनुष्यों के क्षुद्र और नीच भाव हैं। सिंह कह सकता है कि "मनुष्य मेरे लिए बनाये गये हैं।" और वह मूर्ख मनुष्यों के समान प्रार्थना कर सकता है,—"हे ईश्वर ! मनुष्यों को मेरे पास भेज दे कि मैं इनको खाकर अपनी भूख बुझाऊँ। तैने इनको मेरे लिए बनाया है और ये मुझसे भागते हैं।" यदि संसार हमारे लिए बना है तो हम भी संसार के लिए बने हैं। यह कहना कि संसार हमारे भोग-विलास के लिए बनाया गया है, बिलकुल असत्य है। यदि यह सत्य होता तो हम इन भोग-विलासों को छोड़ कर संसार से मुँह न मोड़ते। संसार में हम नहीं रहते, पर भोग-विलास हमारे पीछे भी रहते हैं। इससे तो यह सिद्ध है कि हम भोगों को नहीं भोगते, किन्तु भोग हमें भोग लेते हैं। अतः संसार हमारे लिए नहीं, किन्तु हम संसार के लिए हैं❄
कर्म करने के लिए सब से पहली बात यह है कि हमारा उसमें राग ( लगाव ) न हो, केवल साक्षी और तटस्थ होकर कर्म किये जाओ। मेरे पूज्य और वृद्ध गुरु कहा करते थे—"अपने खास बच्चों
❄ इस सच्चाई को राजर्षि भर्तृ हरिजी ने अपने वैराग्य-शतक में किस उत्तमता से दिखलाया है:—"भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥" अर्थात् हमने भोग नहीं भोगे किन्तु भोगों ने हमको भोग लिया, हमने तप नहीं तपा, किन्तु तीन तापों में हम तप गये। समय नहीं गया, हम चल दिये। तृष्णा पुरानी नहीं हुई, हम बूढ़े हो गये।