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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 98 of 259

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Page 98

षष्ठ अध्याय २ ] [ ३५१
कामिनी-नयनानन्दमन्दिराग कृपानिधिः ।२८।
पद्मया सहित पित्रोः पदयोः प्रणतोऽपतत् ।
सुमतिर्मुदिता पुत्र स्नुषा शक्रं शचीमिव ।
ददृशे त्वमरावत्या पूर्णकामा दिति सती ।२६।
तब विशाखयूप-नरेश ने चन्दन युक्त जल को स्वर्णाकलश मे
भरवा कर नगर और ग्राम मे उससे छिड़काव कराया ।२६। उस समय
वह शम्भल ग्राम दीपमाल, पुष्पो, अगर आदि सुगंधित द्रव्यो, कदली,
पुगीफल, नवीन किसलय, अक्षत तथा ताम्बूल आदि से समन्वित होकर
देवताओ की पुरी के समान मनोहर दिखाई देने लगा ।२७। इसी अवसर
पर स्त्रियो के नेत्रों को आनन्द देने वाले भगवान् कल्कि अपनी सेना
आदि के सहित ग्राम मे प्रविष्ट हुए ।२८। भगवान् कल्कि ने पद्मा के
सहित अपने माता पिता के चरणो मे प्रणाम किया । जैसे इन्द्र और
शची को प्रणाम करते देख कर दिति को आनन्द हुआ था, वैसे ही
सुमति भी अपने पुत्र और पुत्रवधू को देख कर पूर्ण मनोरथ एव अत्यत
हर्षित हुई ।२६।
शम्भलग्राम नगरी पताका ध्वज-शालिनी
अवरोधसुजघना प्रासादविपुलस्तनी ।
मयूरचूचका हस-सघहारमनोहरा ।३०।
पटवासोद्योतधूमवसना कोकिलस्वना ।
सहासगोपुरमुखी वामनेत्रा यथांगना ।
कल्कि पति गुणवती प्राप्य रेजे तमीश्वरम् ।३१।
स रेमे पद्मया तत्र वर्षपूगानजाश्रयः ।
शम्भले विह्वलाकारः कल्किः कल्कविनाशनः ।३२।
कवेः पत्नी कामकला सुषुवे परमेष्ठिनो ।
बृहत्कीर्त्तिबृहद्वाहू महाबल पराक्रमौ ।३३।
प्राज्ञ य सन्नतिर्भार्या तस्या पुत्रौ बभूवतु ।